गुरुवार, 16 मार्च 2023

"योद्धाओं से राजाओं तक: यादव समुदाय की यात्रा"

 "योद्धाओं से राजाओं तक: यादव समुदाय की यात्रा"

  1. "प्राचीन काल से यादव समुदाय का इतिहास"
  2. "यादव समुदाय के वीर योद्धा"
  3. "यादव समुदाय के राजनैतिक इतिहास का अध्ययन"
  4. "यादव समुदाय के धर्म और संस्कृति"
  5. "यादव समुदाय के सामाजिक संरचना और व्यवहार"
  6. "यादव समुदाय के व्यापार और अर्थव्यवस्था"
  7. "यादव समुदाय के महिला और उनकी स्थिति"
  8. "यादव समुदाय के शिक्षा और विकास"
  9. "यादव समुदाय के वर्तमान स्थिति और भविष्य"
  10. "यादव समुदाय के योगदान और महत्व".

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

यदुवंश सामाजिक व् राजनितिक हाशिये पर

यदुवंश सामाजिक व् राजनितिक हाशिये पर

60 के दशक के अंत की तरफ का दौर था ,देश में एक राजनितिक परिवर्तन के लिए व् भ्रष्ट कांग्रेसी-राज़ को खत्म करने के लिए जन-आंदोलनों का दौर था i समाजवादी आन्दोलन के महानायक के रूप में लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, रामसेवक सिंह जी यादव आदि समाजवादी चिंतक आगे आये i गैर-कांग्रेसवाद का नारा उठा और फलस्वरूप हरियाणा,बिहार,UP में गैर-कांग्रेसी सरकारे बनी और राव बिरेन्द्र सिंह जी,चरण सिंह,कर्पूरी ठाकुर आदि का नेतृत्व उभर कर आया i लेकिन ये प्रयोग विफल हुआ और कांग्रेस फिर से सत्ता में आई i भ्रष्ट कांग्रेसी-राज़ में धड़ाधड़ पुलिस एनकाउंटर हो रहे थे ,करीब 2200 लोगों का एनकाउंटर हुआ जिसमें अधिकांश यादव थे i माननीय हुकुमदेव नारायण सिंह जी बोलते हैं कि सिर्फ यादवों के जवानों की चौड़ी छाती थी गोली खाने के लिए , एनकाउंटर लिस्ट में मुलायम सिंह जी का भी नाम शामिल हुआ लेकिन वो किसी तरह बच गये i फिर उस निरंकुश कांग्रेसी शासन का विरोध करने और उस को खत्म करने के लिए JP के दौर में “सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है “ का नारा जन-जन में गूंजा और उस दौर में लोहिया व् JP के शिष्य मुलायम सिंह जी ,लालूजी, शरद बाबू आदि यादव युवक लोहिया जी के सिधान्तों के तहत राजनितिक नभ पर छा गये और उस निरंकुश,भ्रष्ट,परिवार-वादी, सामन्ती शासन को उखाड़ फेका i .....लेकिन वक्त के साथ लोहिया/JP के शिष्य खुद रास्ता भटक गये ... वे खुद कांग्रेस की गौद में जा बैठे और भ्रष्ट,परिवार-वादी,सत्ता-लोलुप हो गये i लेकिन इतना ही नहीं, इन ने अपने स्वार्थ व् परिवार-वाद में सम्पूर्ण यदुवंश के हितों और गरिमा को राजनीति के उस चौसर/जुए में दाँव पर उस तरह लगा दिया जैसे कि पांडवों ने “द्रौपदी” को पापी दुर्योधन के सामने “दाँव” पर लगा दिया था, ताकि द्रौपदी की तरह सम्पूर्ण यदुवंश का “चीर-हरण”हो सके i कौम के “खवैया” ही कौम की कश्ती को निजी स्वार्थों में डुबा दिए और इनके परिवार तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पल गये लेकिन गरीब “अहीर” की हालत बद से बदतर होती चली गयी i सम्पूर्ण भारतीय-समाज इस तरह यादव-विरोधी हो गया जिसकी परिणीती के रूप में स्वतंत्रता संग्राम के महानायक राजा राव तुला सिंह जी की प्रतिमा को छति पहुँचाना व् अनादर करना , नॉएडा के जितेन्द्र यादव का फर्जी एनकाउंटर आदि कौम यदुवंश के प्रति नफरत का एक मंजर मात्र था i ..........अब वक्त आ गया है कि अलवर और अजमेर लोकसभा क्षेत्रों में हार से भाजपा को ये एहसास होना चाहिए कि देश की सबसे बड़ी कौम “यदुवंश” के बारे में उसको चिन्तन-मंथन करना ही पड़ेगा i अगर भाजपा “अहीर रेजिमेंट” के लिए हाँ भरती तो निश्चित रूप से उसे दोनों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल होती क्यों जहाँ अलवर क्षेत्र यादव बाहुल्य है वहीँ अजमेर में भी करीब 50 हजार यादव वोट हैं जो “अहीर रेजिमेंट” जैसे भावनात्मक मुद्दे पर एकमुश्त उस पार्टी को मिलते जो “अहीर रेजिमेंट” के लिए हामी करती i डॉक्टर कर्ण सिंह जी को जीत की बधाईयाँ , लेकिन अब उन को “अहीर रेजिमेंट” के बारे में अपनी पार्टी को अवगत कराना ही होगा नहीं तो 2019 में ये यक्ष-प्रश्न उनके सामने खड़ा रहेगा और यादव-वोट उनसे दूर i आरक्षण के मुद्दे पर एक बहुत छोटा सा पटेल वोट-बैंक गुजरात में और एक मामूली फिल्म के मुद्दे पर जब राजपूत वर्ग के वोट एकजुट हो सकते हैं तो देश की सबसे बड़ी कौम यदुवंश अपने सबसे बड़े मुद्दे “अहीर रेजिमेंट” पर अपने बड़े वोट-बैंक को किस तरफ झुकाव करेगी, ये अब सत्ताधारी लोगों को सोचना ही पड़ेगा i 

अब सिर्फ एक नारा है ....


”वोट वो ही पायेगा , 

जो “अहीर रेजिमेंट “ बनवायेगा i 
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सिंहनी के जाये शेर अहीर I 
रणबांके हैं वीर अहीर II 
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II शूरवीरों में अति शूरवीर अहीर II 
II वीर भोग्या वसुन्धरा II 
II राष्ट्र-रक्षा परम धर्म है,अहीर रेजिमेंट राष्ट्र-रक्षा हेतु बलिदान के लिए II 
...........................
डॉक्टर ईश्वर सिंह यादव "अजीत" (09215730160)
यादव अस्पताल , रेवाड़ी, हरियाणा

रविवार, 28 जनवरी 2018

यादव सभा (रजि.) चंडीगढ़ की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी का गठन

दिनांक 28 जनवरी 2018 को यादव सभा (रजि.) चंडीगढ़,पंचकूला के नवनिर्वाचित कार्यकारिणी सदस्यों का पूर्व अध्यक्षश्री विजय पाल सिंह यादव (पूर्व डी.एस.पी. चंडीगढ़)  द्वारामाल्यार्पण करके स्वागत किया गया एवं समाज हितों के लिएसुखद कार्यकाल की शुभकामनाएं दी I  इस अवसर परनवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री एम एस यादव (एचसीएस), वरिष्ठउपाध्यक्ष श्री बीएल सिंह यादव , महासचिव श्री कपूर सिंहयादव एवं कार्यकारिणी के  अन्य सदस्यों ने सामूहिक रूप सेविश्व बंधुत्व एवं शांति हेतु हवन यज्ञ करके लोकमंगलकामनाओं के साथ  सभा द्वारा भविष्य में किए जाने वालेकार्यों की रूपरेखा तैयार की I  अन्य उपस्थित पदाधिकारियों/ सदस्यों ने अपने-अपने  विचार प्रकट किए I

समाज से सम्बन्धित सूचनाओं को yuvayaduvanshi@gmail.com पर भेजें 
https://goo.gl/tL7DJ3

बुधवार, 6 सितंबर 2017

धैर्य एवं सहनशीलता खोता हुआ समाज

धैर्य एवं सहनशीलता खोता हुआ समाज







आज का हमारा समाज कितना बदल गया हैं, या बदलता जा रहा हैं, और कहाँ जाकर रुकेगा, यह हमारी कल्पना परिधि में भी नहीं है ।
आज का युवा, धैर्य तथा सहनशीलता के अभाव में आज की आधुनिकता से सराबोर हो कर जीवनशैली को तीब्र गति तो दे ही रहा है, साथ हिंसक भी होता जा रहा है ।
परन्तु हमें पिछले सप्ताह दिल दहला देने वाली ऐसी घटना से दुखी होना पड़ा, जिसमें एक बेहद अनुशासित, शालीन सौम्य, अपने माता पिता का एकलौता बेटा तथा बहुत ही छोटे दो मासूम बच्चों के पिता, प्रवीण जी निवासी सेक्टर 37, चंडीगढ की जान चली गई ।
इस बेहद दुखद घटना को अंजाम देने वाला युवा नहीं बल्कि वह व्यक्ति भारतीय फ़ौज से सेवानिवृत्त कर्नल है । जो बहुत ही मामूली तौर पर उसकी कार उस युवा व्यक्ति की कार से रगड़ खा जाने के कारण अब वह व्यक्ति इतिहास बन गया है ।
हम सभी बडी उम्र के लोग, युवा वर्ग के उग्र होने की बात तो करते हैं, परन्तु जब युवाओं को मार्गदर्शित करने वाले ही ऐसी शर्मनाक हरकत करने लगेंगे तो युवा समाज कहाँ और किस दिशा में जाएगा, कहना बहुत मुश्किल हो रहा है ।
फिर भी हमें तथा हमारे देश के सम्माननीय नागरिकों द्वारा इस सेवानिवृत्त कर्नल की निंदा तो करनी ही चाहिए ।
अनुशासित रह कर नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति भी जब क़ानून अपने हाथ में ले कर सड़क पर ही सही ग़लत का निर्णय करने वाला न्यायाधीश तथा जल्लाद बन जाय ।
ऐसे व्यक्ति को अपने द्वारा किए गए ऐसे व्यवहार पर शर्म आनी चाहिए ।
जो व्यक्ति ऐसे मामूली सी ग़लती पर हत्या का कारण बन गया हो, उसके लिए निर्णय आप का, क्या इन्हें अपने इस दुखद कृत्य  के लिए दंडित किया जाना चाहिए...........?


साभार : बी एल सिंह 

सोमवार, 28 अगस्त 2017

जरुरत है जागरूकता की.. विवेक पैदा करने की

विचारणीय !



एक सवाल आज शाम से ही कौंध रहा है..........कौन लोग होते हैं बाबाओं के लिए बेसुध होकर रोने वाले.. संतों के लिए कुछ भी फूंकने वाले.. किसी देवी माँ का फाइव स्टार आशीर्वाद लेने वाले. किसी के लिए अपनी जान तक दे देने वाले. बाबा की हरी चटनी खाकर अरबपति बन जाने वाले..?
कुछ जबाव भी सामने आ रहे है!
दरअसल इस भीड़ के मूल में दुःख है.. अभाव है.. गरीबी है.. और शारीरिक मानसिक शोषण है.. अहंकार के साथ कुछ हो जाने की तमन्ना है.
एक ऐसा विश्वास है जिस पर आडंबरों की फसल लहलहाती है.. आप जरा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि ऐसे भक्तों की संख्या में ज्यादा संख्या महिलाओं, गरीबों, दलितों और शोषितों की है.. इनमें कोई अपने बेटे से परेशान है तो कोई अपने बहू से किसी का जमीन का झगड़ा चल रहा तो किसी को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपनी सारी जायदाद बेचनी पड़ी है. किसी को सन्तान चाहिए किसी को नौकरी!

यानी हर आदमी एक तलाश में है.. ये भीड़ रूपी जो तलाश है. ये धार्मिक तलाश नहीं है. ये भौतिक लोभ की आकांक्षा में उपजी प्रतिक्रिया है.

जिसे स्वयँ की तलाश होती है वो उसे भीड़ की जरूरत नहीं उसे तो एकांत की जरूरत होती है..
वो किसी रामपाल के पास नहीं, किसी राम कृष्ण परमहंस के पास जाता है.. वो किसी राम रहीम के पास नहीं.. रामानन्द के पास जाता है.. उसे पैसा, पद और अहंकार के साथ भौतिक अभीप्साओं की जरूरत नहीं. उसे ज्ञान की जरुरत होती है..

गीता में भगवान कहते हैं..
न ही ज्ञानेन सदृशं पवित्रम – इह विद्यते

अर्थात ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं है.. न ही गंगा न ही ये साधू संत और न ही इनके मेले और झमेले..

लेकिन बड़ी बात कि आज ज्ञान की जरूरत किसे हैं.. ? चेतना के विकास के लिए कौन योग दर्शन पढ़ना चाहता है.. कृष्णमूर्ति जैसे शुद्ध वेदांत के ज्ञाता के पास महज कुछ ही लोग जाते थे.. ऐसे न जाने कितने उदाहरण भरे पड़े हैं और कितने सिद्ध महात्माओं को तो हम जानते तक नहीं… यहाँ जो चेतना को परिष्कृत करने ध्यान करने और साधना करने की बातें करता है उसके यहां भीड़ कम होती है और जो नौकरी देने, सन्तान सुख देने और अमीर बनाने के सपने दिखाता है उसके यहाँ लोग टूट पड़ते हैं.. वहीं सत्य साईं बाबा के यहाँ नेताओं एयर अफसरों की लाइन लगी रहती थी, क्योंकि वो हवा से घड़ी, सोने की चैन, सोने शिवलिंग प्रगट कर देते थे, राख और शहद बांट रहे थे.

क्या ताज्जुब है कि जो साईं बाबा पूरे जीवन फकीरी में बिता दिए. उनकी मूर्तियों में सोने और हीरे जड़ें हैं.. जिस बुद्ध ने धार्मिक आडम्बरो को बड़ा झटका दिया संसार मे उन्हीं की सबसे ज्यादा मूर्तियां हैं.

दरअसल ये सब अन्धविश्वास एक दिन में पैदा नहीं होता, ये पूरा एक चक्र है.. जरा ध्यान से टीवी देखिये, रेडियो सुनिये, तो हम क्या देख रहें हैं..क्या सुन रहें हैं.. अन्धविश्वास ही तो देख रहें हैं.. वही तो सुन रहे हैं… यानी ठंडा मन कोकाकोला होता है, फलां बनियान पहन लो लड़कियां तुम्हारे लिए सब कुछ कर देंगी, ये इत्र लगाओ तो लड़कियां तुम्हारे लिए मर जाएंगी, इस कम्पनी की चड्ढी पहन लो तो गुंडे अपने आप भाग जाएंगे, ये पान मसाला खाओ स्वास्थ्य इतना ठीक रहेगा कि दिमाग खुल जाएगा..

ये सब बेवकूफियों पर रोक लगनी चाहिए या नहीं.. तभी हम चाहें कोई आर्थिक बाजार हो या धार्मिक बाजार इससे बच सकतें हैं.. ये धार्मिक गुरु जो होतें हैं.. ये काउंसलर होते हैं. ये धार्मिक एडवर्टाइजमेंट करते हैं।..जहां आदमी का विवेक शून्य हो जाता है..और आप वही करने लगतें हैं जो आपके अवचेतन में भर दिया जाता है..

आज जरुरत है जागरूकता की.. विवेक पैदा करने की. जरा तार्किक बनने की और उससे भी ज्यादा ज्ञान की तलाश में भटकते रहने की.. वरना हम यूँ ही भटकते रहेंगे…

“आतम ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई काशी”

ऋते ज्ञानात न मुक्तिः

 अर्थात ज्ञान के बिना कोई मुक्ति नहीं है
:साभार 

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

Rezang La War History

Rezang La War Story: रेज़ांगला युद्ध की अनसुनी वीरगाथा 






भारत में कम ही लोग हैं जो 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध को याद करना पसंद करते हैं. वजह साफ है… 1962 के युद्ध के घाव इतने गहरे हैं कि कोई भी देशवासी उसको कुरेदना नहीं चाहता. यहां तक की भारतीय सेना भी उस युद्ध के बारे में ज्यादा बात करती नहीं दिखती. लेकिन ऐसा नहीं है कि 1962 युद्ध ने सिर्फ हमें घाव ही दिए हैं. उस युद्ध ने हमें ये भी सिखाया है कि विषम परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिक बहादुरी से ना केवल लड़ना जानते हैं, अपनी जान तक देश की सीमाओं की रक्षा के लिए न्यौछावर नहीं करते हैं, बल्कि दुश्मन के दांत भी खट्टे करना जानते हैं.

1962 युद्ध के दौरान लद्दाख के रेज़ांग-ला में भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों से जो लड़ाई लड़ी थी उसे ना केवल भारतीय फौज बल्कि चीन के साथ-साथ दुनियाभर की सेनाएं भी एक मिसाल के तौर पर देखती हैं और सीख लेना नहीं भूलती.

चीन का तिब्बत पर हमला, फिर कब्जा और दलाई लामा के भागकर भारत में राजनैतिक शरण लेने के बाद से ही भारत और चीन के रिश्तों में बेहद खटास आ चुकी थी. ऐसे में चीन की लद्दाख में घुसपैठ और कई सीमावर्ती इलाकों में कब्जा करने के बाद भारतीय सेना ने भी इन इलाकों में अपनी फॉरवर्ड-पोस्ट बनानी शुरु कर दी थी. भारत का मानना था कि चीन इन सीमावर्ती इलाकों में अपनी पोस्ट या फिर सड़क बनाकर इसलिए अपना अधिकारी जमा रही थी क्योंकि ये इलाके खाली पड़े रहते थे. सालों-साल से वहां आदमी तो क्या परिंदा भी पर नहीं मारता था, इसी का फायदा उठाया चीन ने. जिसके चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इन ठंडे रेगिस्तान और बंजर पड़े लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में अपनी पोस्ट बनाने की आज्ञा दी—जिसे आस्ट्रैलियाई पत्रकार एन. मैक्सवेल ने अपनी किताब ‘इंडियाज चायना वॉर’ में नेहरु की ‘फॉरवर्ड-पोलिसी’  नाम देकर बदनाम करने की कोशिश की है.



लद्दाख के चुशुल इलाके में करीब 16,000 फीट की उंचाई पर रेज़ांगला दर्रे के करीब भारतीय सेना ने अपनी एक पोस्ट तैयार की थी. इस पोस्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी कुमाऊं रेजीमेंट की एक कंपनी को जिसका नेतृत्व कर रहे थे मेजर शैतान सिंह. 123 जवानों की इस कंपनी में अधिकतर हरियाणा के रेवाड़ी इलाके के अहीर (यादव) शामिल थे. चीनी सेना की बुरी नजर चुशुल पर लगी हुई थी. वो किसी भी हालत में चुशुल को अपने कब्जे में करना चाहते थे. जिसके मद्देनजर चीनी सैनिकों ने भी इस इलाके में डेरा डाल लिया था.

इसी क्रम में जब अक्टूबर 1962 में लद्दाख से लेकर नेफा (अरुणाचल प्रदेश) तक भारतीय सैनिकों के पांव उखड़ गए थे और चीनी सेना भारत की सीमा में घुस आई थी, तब रेज़ांग-ला में ही एक मात्र ऐसी लड़ाई लड़ी गई थी जहां भारतीय सैनिक चीन के पीएलए पर भारी पड़ी थी.

17 नवम्बर चीनी सेना ने रेज़ांग-ला में तैनात भारतीय सैनिकों पर जबरदस्त हमला बोल दिया. चीनी सैनिकों ने एक प्लान के तहत रेज़ांग-ला में तैनात सैनिकों को दो तरफ से घेर लिया, जिसके चलते भारतीय सैनिक अपने तोपों (आर्टिलेरी) का इस्तेमाल नहीं कर पाई. लेकिन .303 (थ्री-नॉट-थ्री) और ब्रैन-पिस्टल के जरिए भी कुमाऊं रेजीमेंट के ये 123 जवान चीनी सेना की तोप, मोर्टार और ऑटोमैटिक हथियारों जिनमें मशीन-गन भी शामिल थीं, मुकाबला कर रहे थे. इन जवानों ने अपनी बहादुरी से बड़ी तादाद में चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन चीनी सेना लगातार अपने सैनिकों की मदद के लिए रि-इनफोर्समेंट भेज रही थी.

मेजर शैतान सिंह खुद कंपनी की पांचों प्लाटून पर पहुंचकर अपने जवानों की हौसला-अफजाई कर रहे थे. इस बीच कुमाऊं कंपनी के लीडर मेजर शैतान सिंह गोलियां लगने से बुरी तरह जख्मी हो गए. दो जवान जब उन्हे उठाकर सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे तो चीनी सैनिकों ने उन्हे देख लिया.

परमवीर चक्र विजेता (मरणोपरांत) मेजर शैतान सिंह

शैतान सिंह अपने जवानों की जान किसी भी कीमत पर जोखिम में नहीं डाल सकते थे. उन्होनें खुद को सुरक्षित स्थान पर ले जाना से साफ मना कर दिया. जख्मी हालत में शैतान सिंह अपने जवानों के बीच ही बने रहे. वहीं पर अपनी बंदूक को हाथ में लिए उनकी मौत हो गई.

दो दिनो तक भारतीय सैनिक चीनी पीएलए को रोके रहे. 18 नवम्बर को 123 में से 109 जवान जिनमें कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह भी शामिल थे देश की रक्षा करते मौत को गले लगा चुके थे. लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि भारतीय सैनिकों की गोलियां तक खत्म हो गईं. बावजूद इसके बचे हुए जवानों ने चीन के सामने घुटने नहीं टेकें.

भारतीय गुप्तचर एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनेलिसेस विंग) के पूर्व अधिकारी आर के यादव ने अपनी किताब ‘मिशन आर एंड डब्लू’ में रेज़ांगला की लड़ाई का वर्णन करते हुए लिखा है कि इन बचे हुए जवानों में से एक सिंहराम ने बिना किसी हथियार और गोलियों के चीनी सैनिकों को पकड़-पकड़कर मारना शुरु कर दिया. मल्ल-युद्ध में माहिर कुश्तीबाज सिंहराम ने एक-एक चीनी सैनिक को बाल से पकड़ा और पहाड़ी से टकरा-टकराकर मौत के घाट उतार दिया. इस तरह से उसने दस चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया.

गीतकार प्रदीप द्वारा लिखा गया देशप्रेम से ओतप्रोत गाना जिसे लता मंगेशकर ने गाकर अमर कर दिया था दरअसल वो रेज़ागला युद्ध को ध्यान में ही रखकर शायद रचा गया था.

गीत के बोल कुछ यूं हैं, “….थी खून से लथपथ काया, फिर भी बंदूक उठाके दस-दस को एक एक ने मारा, फिर गिर गये होश गंवा के. जब अंत समय आया तो कह गये के अब मरते हैं खुश रहना देश के प्यारों अब हम तो सफर करते हैं. क्या लोग थे वो दीवाने क्या लोग थे वे अभिमानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी….”

बताते है कि चीन ने इस लड़ाई में पांच भारतीय जवानों को युद्धबंदी बना लिया था जबकि नौ जवान बुरी तरह घायल हो हुए थे.

भारतीय सैनिकों की बहादुरी से हारकर चीनी सैनिकों ने अब पहाड़ से नीचे उतरने का साहस नहीं दिखाया. और चीन कभी भी चुशुल में कब्जा नहीं कर पाया. हरियाणा के रेवाड़ी स्थित इन अहीर जवानों की याद में बनाए गए स्मारक पर लिखा है कि चीन के 1700 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था और चीनी सेना को रेज़ांगला में भारी नुकसान उठाना पड़ा.


वीरगति को प्राप्त हुए मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े पदक परमवीर चक्र से नवाजा गया. मेजर शैतान सिंह और उनके वीर अहीर जवानों की याद में चुशुल के करीब रेज़ांगला में एक युद्ध-स्मारक बनवाया गया. हर साल 18 नवम्बर को इन वीर सिपाहियों को पूरा देश और सेना याद करना नहीं भूलती है. क्योंकि “शहीदों की चितांओं पर लगेंगे हर बरस मेले…देश में मर-मिटने वालों का बस यही एक निशां होगा…”

सोमवार, 10 जुलाई 2017

प्राचीन परंपरा: यदुवंशी करते हैं जलाभिषेक




#इतिहास_काशी_का -: देवाधिदेव महादेव शिव की नगरी हैं काशी हजारों साल पुरानी इस नगरी में आज भी प्राचीन परंपराएं अपने जीवंत स्‍वरूप में मौजूद हैं ऐसी ही एक परंपरा जो यहां सदियों से चली आ रही हैं वह हैं, श्रावण मास के सोमवार के दिन विश्‍वेश्‍वर भगवान शिव के सामूहिक जलाभिषेक की। परंपरानुसार काशी के यादव बंधु अपने पारंपरिक वेष-भूषा में हर साल सबसे पहले भगवान विश्‍वेश्‍वर का पवित्र गंगाजल से सामूहिक अभिषेक करते हैं।

1. पचास हजार यदुवंशी करते हैं जलाभिषेक
काशी में सावन के पवित्र महीने के प्रथम सोमवार को हजारों साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है।श्रावण मास का प्रथम सोमवार अपने आप में ही महाफलदायी माना गया है। महादेव की आराधना वाले इस शुभ दिवस पर वारणसी में यदुवंशी समाज के लोग श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर सहित शहर के लगभग हर शिवालयों में जाकर पतित पावनी माता गंगा के जल से शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं।

2. पहले किया जाता था दुग्‍धाभिषेक
इस संबंध में ईनाडु इंडिया के संवाददाता ने यदुवंशी विद्वानों से बातचीत की। शिवभक्‍त दिलीप यादव बताते हैं, ''एक बार द्वापरयुग में धरती पर प्रलय की स्‍थिति उत्‍पन्‍न हुई। ऐसी स्‍थिति में मनुष्‍य ही नहीं पशु-पक्षी और आर्य संस्‍कृति की आधार मानी गई गऊ माताएं भी अकाल मौत को प्राप्‍त होने लगीं। ऐसी स्‍थिति देख खुद भगवान श्रीकृष्‍ण ने स्वयं अपने हाथों से प्रलयनाथ और विश्‍वनाथ महादेव शिव का दुग्‍धाभिषेक किया। भगवान विष्‍णु के पूर्णावतार श्रीकृष्‍ण द्वारा दुग्‍धाभिषेक किये जाने से शिव अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए और प्रलय लीला की समाप्‍ति हुई। इसके बाद हर वर्ष श्रावण मास में यदुवंशियों द्वारा शिव का दुग्‍धाभिषेक किया जाने लगा।

3. और फिर शुरू हुआ जलाभिषेक
कहते हैं बीच में कुछ काल के लिए भगवान शिव का सामूहिक दुग्‍धाभिषेक बंद हो गया और तकरीबन पांच हजार वर्ष पूर्व धरती पर एकबार फिर प्रलयलीला शुरू हुई। इस बार ब्राह्मणों और ऋषियों ने भगवान श्रीकृष्ण का समरण कराते हुए एक बार फिर यादव बंधुओं का आह्वान किया। लेकिन, बड़े पैमाने पर गोवंश की हानि होने के कारण दूध का आभाव हो गया तब यदुवंशियों ने समझदारी दिखाते हुए भोले भंडारी का गंगाजल से अभिषेक करना शुरू किया। ये परंपरा आज भी कायम हैं !
काशी में यदुवंश के इतिहास की अच्‍छी जानकारी रखने वाले सतीश फौजी बताते हैं कि बीच में यह परंपरा कुछ समय के लिए रुक गयी थी। अंग्रेजों के शासनकाल में इस परंपरा में रुकावट आई थी लेकिन काशी की जनता और यदुवंशियों की भारी मांग को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और इस परंपरा को फिर से पुनर्जीवित किया गया। इसके बाद सन 1932 से यह परंपरा अनवरत हैं फौजी के अनुसार समाज कल्याण के उद्देश्य से आज भी यादव बंधुओं द्वारा इस परंपरा का निर्वाहन किया जा रहा हैं, जिसमें शामिल होने के लिए यादव परिवार का बच्‍चा-बच्‍चा काफी उत्‍साह से भाग लेता हैं...!!

शुक्रवार, 26 मई 2017

भाग्यशाली कौन ?

भाग्यशाली कौन?
Who are lucky

हम अक्सर धन वान व्यक्ति को भाग्यशाली, प्रभावशाली, अन्नदाता, "महान" जैसे शब्दों से आपसी चर्चा में संबोधित करते रहते हैं, परन्तु मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार कह सकता हूँ, "भाग्यशाली" वे हो सकते हैं, जिनको सब कुछ मिला होता है ! "विशेष भाग्यशाली" वे होते हैं जिनको जो मिला होता है, उसको और अच्छा बना लेते हैं ! परन्तु "महान" तो वे ही हो सकते हैं, जो अपने साथ औरों का भाग्य बदल कर उसे भी भाग्यशाली बना देते हैं !!

श्री बी. एल. सिंह यादव जी के फेसबुक वाल से : 
Mr. B. L. Singh Yadav's Facebook Wall:
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मंगलवार, 23 मई 2017

Yuva Yaduvanshi: सपने हक़ीक़त में सच हो सकते हैं

Yuva Yaduvanshi: सपने हक़ीक़त में सच हो सकते हैं

प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है

एक छोटे से शहर के प्राथमिक स्कूल में कक्षा 5 की शिक्षिका थीं।
उनकी एक आदत थी कि वह कक्षा शुरू करने से पहले हमेशा "आई लव यू ऑल" बोला करतीं। मगर वह जानती थीं कि वह सच नहीं कहती । वह कक्षा के सभी बच्चों से उतना प्यार नहीं करती थीं।
कक्षा में एक ऐसा बच्चा था जो उनको एक आंख नहीं भाता। उसका नाम राजू था। 


राजू मैली कुचेली स्थिति में स्कूल आजाया करता है। उसके बाल खराब होते, जूतों के बन्ध खुले, शर्ट के कॉलर पर मेल के निशान। । । व्याख्यान के दौरान भी उसका ध्यान कहीं और होता।

मिस के डाँटने पर वह चौंक कर उन्हें देखता तो लग जाता..मगर उसकी खाली खाली नज़रों से उन्हें साफ पता लगता रहता.कि राजू शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित होने के बावजूद भी मानसिक रूप से गायब हे.धीरे धीरे मिस को राजू से नफरत सी होने लगी। क्लास में घुसते ही राजू मिस की आलोचना का निशाना बनने लगता। सब बुराई उदाहरण राजू के नाम पर किये जाते. बच्चे उस पर खिलखिला कर हंसते.और मिस उसको अपमानित कर के संतोष प्राप्त करतीं। राजू ने हालांकि किसी बात का कभी कोई जवाब नहीं दिया था।
मिस को वह एक बेजान पत्थर की तरह लगता जिसके अंदर महसूस नाम की कोई चीज नहीं थी। प्रत्येक डांट, व्यंग्य और सजा के जवाब में वह बस अपनी भावनाओं से खाली नज़रों से उन्हें देखा करता और सिर झुका लेता । मिस को अब इससे गंभीर चिढ़ हो चुकी थी।
पहला सेमेस्टर समाप्त हो गया और रिपोर्ट बनाने का चरण आया तो मिस ने राजू की प्रगति रिपोर्ट में यह सब बुरी बातें लिख मारी । प्रगति रिपोर्ट माता पिता को दिखाने से पहले हेड मिसट्रेस के पास जाया करती थी। उन्होंने जब राजू की रिपोर्ट देखी तो मिस को बुला लिया। "मिस प्रगति रिपोर्ट में कुछ तो प्रगति भी लिखनी चाहिए। आपने तो जो कुछ लिखा है इससे राजू के पिता इससे बिल्कुल निराश हो जाएंगे।" "मैं माफी माँगती हूँ, लेकिन राजू एक बिल्कुल ही अशिष्ट और निकम्मा बच्चा है । मुझे नहीं लगता कि मैं उसकी प्रगति के बारे में कुछ लिख सकती हूँ। "मिस घृणित लहजे में बोलकर वहां से उठ आईं।
हेड मिसट्रेस ने एक अजीब हरकत की। उन्होंने चपरासी के हाथ मिस की डेस्क पर राजू की पिछले वर्षों की प्रगति रिपोर्ट रखवा दी । अगले दिन मिस ने कक्षा में प्रवेश किया तो रिपोर्ट पर नजर पड़ी। पलट कर देखा तो पता लगा कि यह राजू की रिपोर्ट हैं। "पिछली कक्षाओं में भी उसने निश्चय ही यही गुल खिलाए होंगे।" उन्होंने सोचा और कक्षा 3 की रिपोर्ट खोली। रिपोर्ट में टिप्पणी पढ़कर उनकी आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उन्होंने देखा कि रिपोर्ट उसकी तारीफों से भरी पड़ी है। "राजू जैसा बुद्धिमान बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा।" "बेहद संवेदनशील बच्चा है और अपने मित्रों और शिक्षक से बेहद लगाव रखता है।" "
अंतिम सेमेस्टर में भी राजू ने प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। "मिस ने अनिश्चित स्थिति में कक्षा 4 की रिपोर्ट खोली।" राजू ने अपनी मां की बीमारी का बेहद प्रभाव लिया। .उसका ध्यान पढ़ाई से हट रहा है। "" राजू की माँ को अंतिम चरण का कैंसर हुआ है। । घर पर उसका और कोई ध्यान रखनेवाला नहीं है.जिसका गहरा प्रभाव उसकी पढ़ाई पर पड़ा है। ""
राजू की माँ मर चुकी है और इसके साथ ही राजू के जीवन की चमक और रौनक भी। । उसे बचाना होगा...इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। "मिस के दिमाग पर भयानक बोझ हावी हो गया। कांपते हाथों से उन्होंने प्रगति रिपोर्ट बंद की । आंसू उनकी आँखों से एक के बाद एक गिरने लगे.
अगले दिन जब मिस कक्षा में दाख़िल हुईं तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार अपना पारंपरिक वाक्यांश "आई लव यू ऑल" दोहराया। मगर वह जानती थीं कि वह आज भी झूठ बोल रही हैं। क्योंकि इसी क्लास में बैठे एक उलझे बालों वाले बच्चे राजू के लिए जो प्यार वह आज अपने दिल में महसूस कर रही थीं..वह कक्षा में बैठे और किसी भी बच्चे से हो ही नहीं सकता था । व्याख्यान के दौरान उन्होंने रोजाना दिनचर्या की तरह एक सवाल राजू पर दागा और हमेशा की तरह राजू ने सिर झुका लिया। जब कुछ देर तक मिस से कोई डांट फटकार और सहपाठी सहयोगियों से हंसी की आवाज उसके कानों में न पड़ी तो उसने अचंभे में सिर उठाकर उनकी ओर देखा। अप्रत्याशित उनके माथे पर आज बल न थे, वह मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने राजू को अपने पास बुलाया और उसे सवाल का जवाब बताकर जबरन दोहराने के लिए कहा। राजू तीन चार बार के आग्रह के बाद अंतत:बोल ही पड़ा। इसके जवाब देते ही मिस ने न सिर्फ खुद खुशान्दाज़ होकर तालियाँ बजाईं बल्कि सभी से भी बजवायी.. फिर तो यह दिनचर्या बन गयी। मिस हर सवाल का जवाब अपने आप बताती और फिर उसकी खूब सराहना तारीफ करतीं। प्रत्येक अच्छा उदाहरण राजू के कारण दिया जाने लगा । धीरे-धीरे पुराना राजू सन्नाटे की कब्र फाड़ कर बाहर आ गया। अब मिस को सवाल के साथ जवाब बताने की जरूरत नहीं पड़ती। वह रोज बिना त्रुटि उत्तर देकर सभी को प्रभावित करता और नये नए सवाल पूछ कर सबको हैरान भी।
उसके बाल अब कुछ हद तक सुधरे हुए होते, कपड़े भी काफी हद तक साफ होते जिन्हें शायद वह खुद धोने लगा था। देखते ही देखते साल समाप्त हो गया और राजू ने दूसरा स्थान हासिल कर लिया यानी दूसरी क्लास ।
विदाई समारोह में सभी बच्चे मिस के लिये सुंदर उपहार लेकर आए और मिस की टेबल पर ढेर लग गये । इन खूबसूरती से पैक हुए उपहार में एक पुराने अखबार में बद सलीके से पैक हुआ एक उपहार भी पड़ा था। बच्चे उसे देखकर हंस पड़े। किसी को जानने में देर न लगी कि उपहार के नाम पर ये राजू लाया होगा। मिस ने उपहार के इस छोटे से पहाड़ में से लपक कर उसे निकाला। खोलकर देखा तो उसके अंदर एक महिलाओं की इत्र की आधी इस्तेमाल की हुई शीशी और एक हाथ में पहनने वाला एक बड़ा सा कड़ा था जिसके ज्यादातर मोती झड़ चुके थे। मिस ने चुपचाप इस इत्र को खुद पर छिड़का और हाथ में कंगन पहन लिया। बच्चे यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। खुद राजू भी। आखिर राजू से रहा न गया और मिस के पास आकर खड़ा हो गया। ।
कुछ देर बाद उसने अटक अटक कर मिस को बताया कि "आज आप में से मेरी माँ जैसी खुशबू आ रही है।"
समय पर लगाकर उड़ने लगा। दिन सप्ताह, सप्ताह महीने और महीने साल में बदलते भला कहां देर लगती है? मगर हर साल के अंत में मिस को राजू से एक पत्र नियमित रूप से प्राप्त होता जिसमें लिखा होता कि "इस साल कई नए टीचर्स से मिला।। मगर आप जैसा कोई नहीं था।" फिर राजू का स्कूल समाप्त हो गया और पत्रों का सिलसिला भी। कई साल आगे गुज़रे और मिस रिटायर हो गईं। एक दिन उन्हें अपनी मेल में राजू का पत्र मिला जिसमें लिखा था:
"इस महीने के अंत में मेरी शादी है और आपके बिना शादी की बात मैं नहीं सोच सकता। एक और बात .. मैं जीवन में बहुत सारे लोगों से मिल चुका हूं।। आप जैसा कोई नहीं है.........डॉक्टर राजू
साथ ही विमान का आने जाने का टिकट भी लिफाफे में मौजूद था। मिस खुद को हरगिज़ न रोक सकती थीं। उन्होंने अपने पति से अनुमति ली और वह दूसरे शहर के लिए रवाना हो गईं। शादी के दिन जब वह शादी की जगह पहुंची तो थोड़ी लेट हो चुकी थीं। उन्हें लगा समारोह समाप्त हो चुका होगा.. मगर यह देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि शहर के बड़े डॉ, बिजनेसमैन और यहां तक कि वहां पर शादी कराने वाले पंडितजी भी थक गये थे. कि आखिर कौन आना बाकी है...मगर राजू समारोह में शादी के मंडप के बजाय गेट की तरफ टकटकी लगाए उनके आने का इंतजार कर रहा था। फिर सबने देखा कि जैसे ही यह पुरानी शिक्षिका ने गेट से प्रवेश किया राजू उनकी ओर लपका और उनका वह हाथ पकड़ा जिसमें उन्होंने अब तक वह सड़ा हुआ सा कंगन पहना हुआ था और उन्हें सीधा मंच पर ले गया। माइक हाथ में पकड़ कर उसने कुछ यूं बोला "दोस्तों आप सभी हमेशा मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछा करते थे और मैं आप सबसे वादा किया करता था कि जल्द ही आप सबको उनसे मिलाउंगा।।।........यह मेरी माँ हैं - ------------------------- "
___
!! प्रिय दोस्तों.... इस सुंदर कहानी को सिर्फ शिक्षक और शिष्य के रिश्ते के कारण ही मत सोचिएगा । अपने आसपास देखें, राजू जैसे कई फूल मुरझा रहे हैं जिन्हें आप का जरा सा ध्यान, प्यार और स्नेह नया जीवन दे सकता है...........

साभार : एक मित्र द्वारा व्हाट्सएप पर भेजी गया प्रसंग 

सपने हक़ीक़त में सच हो सकते हैं


सपने हक़ीक़त में सच हो सकते हैं:-

Dreams can come true in reality

   हमारी अपेक्षा प्रत्येक सामने वाले व्यक्ति से यही रहती है, कि वह बिलकुल ऐसा व्यवहार करे, जो केवल हमें पसन्द हो, उसमें चाहे वह बहुत ही नज़दीकी परिवार का हो, या समाज से अन्य सम्बन्धी लोग । जिनको हम मिलते रहते हैं, खास कर हम अपने जीवन साथी से कुछ ज़्यादा ही अपेक्षाएँ रखते हैं । जब की सच्चाई यह है, कि यदि आप का जीवनसाथी आप की ही तरह हो जाय, तो सायद आप का जीवन नीरस हो जाएगा । और ऐसी उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि आप का जीवनसाथी सोंच में, कर्म में आप के जैसा ही हो । यही कलह का बड़ा कारण हो सकता है, यदि हम अपनी असम्भव सी अपेक्षाएँ नियन्त्रण में रख कर व्यवहार करें, तो इसी से ज़िन्दगी का भरपूर मज़ा भी लिया जा सकता है । चुंकि दोनों का निर्माण अलग-अलग ढंग से हुआ है, इस लिए दोनों में से एक कोई ऐसा काम करेगा, जो दूसरे को बिल्कुल पसन्द या नहीं पसन्द होगा । ऐसी स्थिति में झंझट से बचने के लिए रास्ते भी आप को ही ढूँढने पड़ेगें । विवाह के पूर्व आप को ऐसे अनुभव कभी नही हुए होगे, जो विवाह के पश्चात हुए हैं । जीवनसंगी आप को कुछ ऐसा भी दिखा जाता है जिसको जान कर आप चौंकते हुए कहेंगे, कि दुनिया में ऐसा भी होता है, सच में ऐसा होता है जो बहुत ही सुखद या डरावना होता है । यदि आप इस तनाव से बचना चाहते हैं, तो जीवन जीनें के तरीक़े में कुछ बदलाव करने होंगे क्यों कि दोनों का स्वभाव विपरीत है । 

   इस बात को समझते हुए जब भी उपयुक्त अवसर मिले जीवन साथी की प्रशंसा का कोई भी अवसर मत चूकिए । सच तो यह है कि भगवान ने पूरी तरह से बुरा तो किसी को नहीं बनाया और हर तरह से अच्छा भी किसी को नहीं गढ़ा । इस लिए जीवन साथी की अच्छाइयों को नोटिस में लेकर प्रशंसा करने की आदत बना लें । आप देखेंगे जिस जीवन को आप जैसा जीने की चाहत रखते हैं । उससे कहीं ज़्यादा ख़ुशहाल जीवन जी सकेंगे, जो सायद आप की कल्पना में भी न रहा हो ।

साभार: 

रविवार, 21 मई 2017

सफलता और असफ़लता के बीच की दुरी




     

    

कई बार आप "सफल" होने के काफी क़रीब पहुँच कर भी "असफल" हो जाते हैं, इसका मतलब यह क़तई नहीं कि आप के प्रयास में कोई कमी है, इसका सीधा सा कारण है, कि आप महसूस नही कर पाए, और "सफलता" की अन्तिम सीढ़ी से बंचित हो गए । इस लिए आप का प्रयास तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक खुद को "सफल" हो जाने का पक्का यक़ीन न हो जाय ।





















साभार : श्री बी. एल. सिंह यादव 
लेखक, विचारक एवं सामजिक कार्यकर्त्ता 


शुक्रवार, 12 मई 2017

मानवीय रिस्तों का महत्व

कभी कभी हमारे लिए भी अच्छा है कि हम कुछ मामलों में अंधे बने रहें


एक आदमी ने बहुत ही सुंदर लड़की से विवाह किया।
वो उसे बहुत प्यार करता था। अचानक उस लड़की को
चर्मरोग हो गया कारण वश उसकी सुंदरता कुरूपता में
परिवर्तित होने लगी। अचानक एक दिन सफर में
दुर्घटना से उस व्यक्ति के आँखों की रौशनी चली गई।
दोनों पति-पत्नी की जिंदगी तकलीफों के बावजूद भी एक
दूसरे के साथ प्रेम पूर्वक चल रही थी।
दिन ब दिन पत्नी अपनी सुंदरता खो रही थी पर पति के
देख न पाने के कारण उनके प्यार में कोई कमी नही आ रही थी ।
दोनों का दाम्पत्य जीवन बड़े प्यार से चल रहा था।
रोग के बढ़ते रहने के कारण पत्नी की मृत्यु हो गई।
पति को बहोत दुःख हुआ और उसने उसकी यादों के साथ
जुड़ा होने के कारण उस शहर को छोड़ देने का विचारकिया।
उसके एक मित्र ने कहा अब तुम पत्नी के बिना सहारे
अंजान जगह अकेले कैसे चल फिर पाओगे ?
उसने कहा मैं अँधा होने का नाटक कर रहा था,क्यों की
अगर मेरी पत्नी को ये पता चल जाता की मैं देख
सकता हूँ तो उसे अपने रोग से ज्यादा कुरूपता पर दुःख
होता और में उसे इतना प्यार करता था,की किसी भी
हालत में उसे दुखी नही देख सकता था।
वो एक बहोत ही अच्छि पत्नी थी और मैं उसे हमेशा खुश देखना चाहता था। 

इस कहानी से जो सीख मिली है:----


कभी कभी हमारे लिए भी अच्छा है कि हम कुछ मामलों
में अंधे बने रहें, वही हमारी ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण होगा।
बहुत वार दांत जीभ को काट लेते हैं फिर भी मुंह में एक
साथ रहते हैं, यही माफ़ कर देने का सबसे बड़ा उदाहरणहै।
मानवीय रिस्तों बिना हम हमेशा अधूरे हैं
,इसलिए हमेशा जुड़े रहें।... 

एक छोटा सा प्रयास आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है 
अच्छा लगे तो औरों को भेजना |  

अपने अमूल्य  सुझाव / विचार  जरूर दें 

pictures courtesy




मंगलवार, 9 मई 2017

नृसिंह: अर्ध सिंह, अर्ध मनुष्य

नृसिंह चतुर्दशी के दिन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने अर्ध सिंह, अर्ध मनुष्य के रूप में अवतार लिया था।




 जैसा की श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्य्हम् ।। [ भ० गी० ४.७]

“हे भरतवंशी! जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।”


परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।। [भ० गी० ४.८]

“भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की पुन: स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।”

भगवान श्री कृष्ण के नृसिंह अवतार लेने के दो उद्देश्य थे – पहला , अपने भक्त प्रह्लाद का उद्धार करना और दूसरा, दुष्टों  का  विनाश करना।

‘प्रह्लाद’ का शाब्दिक अर्थ है –
 “पराकाष्ठा रूपेण आह्लाद” अर्थात् सदा आनंद से परिपूर्ण।

यह सारी कथा भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज और उनके नास्तिक और निर्दयी पिता हिरण्यकशिपु के बीच मतभेद पर आधारित हैI प्रह्लाद महाराज सिर्फ पाँच वर्ष के बालक थे और उनका अपराध क्या था? सिर्फ इतना की वह कृष्ण भक्त थे और ‘हरे कृष्ण’ का जाप करते थे। पर उनके पिता इतने निर्दयी थे की वे अपने पुत्र की भक्ति से क्रोधित थे।

‘हिरण्यकशिपु ‘ का शाब्दिक अर्थ है – “जो स्वर्ण और मखमल के सेज के प्रति आसक्त हो “, जो की सांसारिक लोगों  का परम लक्ष्य है। उसने अपने पुत्र को कई तरह से प्रताड़ित किया। दानव सदैव भगवान के भक्तों  के विरुद्ध होते है। हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद महाराज को विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करने के बाद भी उनको कृष्ण भक्ति के मार्ग से भ्रमित न कर पाया।

एक दिन उसने अपने पुत्र को बुला कर स्नेहपूर्वक गोद में उठा लिया और फिर उससे पूछा की “अब तक तुमने अपने अध्यापकों से कौन सी सर्वश्रेष्ठ बात सीखी?”  तो प्रह्लाद महाराज ने बताया –

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्र्चेन्नवक्षणा ।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्।।

[श्री० भा० ७.५.२३-२४]

अर्थात्  “हमें श्री विष्णु के दिव्य नाम, रूप, गुण, आभूषण एवं सेवा सामग्री तथा लीलाओं के बारे में सुनना, कीर्तन करना, स्मरण करना, उनके चरणों की सेवा करना, शोडशोपचार पूजा करना, वंदना करना, उनके सेवक बनना, उनको अपना मित्र मानना और उनको सर्वस्व समर्पण करना (अर्थात काया, वाचा, मनसा उनकी सेवा में लिन रहना) – यह नव विधान शुद्ध भक्ति कहलाते हैंI जिस व्यक्ति ने अपने जीवन को श्री कृष्ण की भक्ति में इन नव विधानों द्वारा समर्पित किया हो उसको सबसे विद्वत्त समझना चाहिए क्योंकि उसने सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित कर लिया है।”

अपने पुत्र प्रह्लाद के मुख से भक्ति के इन वचनों को सुन कर हिरण्यकशिपु अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने कँपकँपाते होठों से गुरु शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड से इस प्रकार कहा,”अरे ब्राह्मण के अयोग्य नृशंस पुत्र! तुमने मेरे बालक को भक्ति का पाठ पढ़ाया है?” गुरु शुक्राचार्य के पुत्र ने बताया की उसने या किसी ने उसे यह नहीं पढ़ाया है। उसमे यह भक्ति स्वतः उत्पन्न हुई है। हिरण्यकशिपु ने तब अपने पुत्र से कहा, ” रे धूर्त! हमारे परिवार के सबसे अधम! यदि तुमने यह शिक्षा अध्यापकों से नहीं प्राप्त की तो कहाँ से प्राप्त की?” प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया,

श्रीप्रह्राद उवाच
मतिर्न कृष्णे परत: स्वतो व
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं
पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम् ।।
[श्री० भा० ७.५.३०]
“प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया, अनियंत्रित इंद्रियों के कारण वे व्यक्ति जो भौतिक जीवन से अति मोहित हैं वह चबाये हुए को चबाते नर्क की ओर अग्रसर हैं। दूसरों के बोधन से, अपने प्रयासों से अथवा इन दोनों के मिश्रित प्रभाव से भी उनमें श्री कृष्ण के प्रति आसक्ति कभी जागृत नहीं होती।”

दो शब्द हैं – एक गृहस्थ और दूसरा गृहव्रत अथवा गृहमेधी। क्योंकि प्रह्लाद अपने पिता की ओर इशारा कर रहा था की वह गृहव्रत है, तो उसने कहा – यदि भौतिक संसार में इस शरीर के साथ कोई सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता हैं तो वह आत्म चिंतन से अथवा सम्मेलन द्वारा ही कभी भी कृष्ण भावनामृत में नहीं आ सकते। ऐसे व्यक्तियों की स्थिति क्या होती है? अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं… वे अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते अत: उनका मार्ग उन्हें नारकीय जीवन की ओर ले जाता है। उनका मात्र एक कर्म होता है- पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम्… चबाये हुए को चबाना।

सांसारिक सुख का अर्थ है -चबाये हुए को पुन: चबाना। जिस प्रकार एक पिता यह जनता है की उसने विवाह कर परिवार को सुखपूर्वक जीवन प्रदान करने भरसक प्रयास किया पर अंतत: सभी अतृप्त रहे, फिर भी वह अपनी संतान को इसी कार्यकलाप में संलग्न करता है। स्वयं का इस सांसारिक जीवन में बहुत बुरा अनुभव होने के उपरांत भी वह अपनी संतान को सांसारिक सुखों के पीछे भागना सिखाता है। इसी को कहते है ‘पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम्’। यह वही परिस्थिति जैसे गन्ने  को कोई चबाए और सारा रस निकाल कर फ़ेंक दे और इस चबाए हुए गन्ने को फिर चबा कर रस निकालना चाहे।

सांसारिक सुख का अर्थ है -‘संभोग’ जो यहाँ का अंतिम और चरम सुख है। जो व्यक्ति इन्द्रिय सुख की ओर बहुत आकर्षित रहते हैं वे निष्कर्ष निकाल लेते हैं की हम परिवार और समाजिक जीवन में ही सुखी रह सकते हैं और सुख में स्त्री और बच्चों का होना अनिवार्य है। ऐसे जीवन में अवश्य कुछ आनंद है परंतु शासत्रानुसार, इसकी मान्यता क्या है?

श्रील विद्यापति ठाकुर अपने एक गीत में लिखते हैं,

तातल सैकते वारिबिंदुसम सुतमितरमणिसमाजे

निः संदेह गृहस्थ जिवन में कुछ आनंद अवश्य होगा अन्यथा इतने लोग इसके लिए क्यों व्याकुल हैं। किंतु यह आनंद तुच्छ और क्षणिक है। इस आनंद की तुलना मरुस्थल में जल बिंदु से की गई है। यदि हम मरुस्थल को बगीचा बनाना चाहें तो उसके लिए एक समुद्र भर जल की आवश्यक्ता होगी। यदि कोई यह कहे की ‘तुम्हे पानी चाहिए? एक बूँद ले लो’, तो यह बात हास्यप्रद होगी? उसी प्रकार यदि हमारा मन भौतिक अभिलाषाओं में मग्न है, तो वह इस मरुभूमि रूपि संसार में एक बूंद के प्रति आसक्त होना है। इसमे दीर्धकिलीन सुख का कोई आसार नहीं है।

वास्तव में हम कृष्ण के  प्रति आतुर हैं किंतु इस इच्छा से अनभिज्ञ हैं। हम अपनी इच्छाओं को संसार की भौतिक वस्तुओं से संतुष्ट करना चाहते है जो असंभव है। हम आशा के विरुद्ध आशा करते हैं।  जिस प्रकार यदि किसी मछली को पानी से बाहर निकाल कर एक बहुत सुंदर सेज पर लेटा दिया जाये तो वह कभी खुश नहीं रह सकती। उसी प्रकार जीवात्मा जब तक अपने स्वभावानुसार आध्यात्मिक वातावरण में विचरण नहीं करती, वह सुखी नहीं हो सकती।  इसी कारण वश जगत में हर कोई निराश व परेशान है।

अगला प्रश्न यह उठता है कि आखिर लोग इस भौतिक जीवन के भोग के लिेए क्यों इतने व्याकुल हैं? इस प्रश्न का उत्तर  प्रह्लाद महाराज देते हैं –

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिरर्थमानिनः।
अन्धा यथान्धैरुपनीयामाना-
स्तेपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धा ।।
[ श्री० भा० ७.५.३१]
“जो व्यक्ति दृढ़ रुप से भौतिक सुख की कामना में बद्ध हैं, अथ: जिन्होंने अपने समान बाह्य वस्तुओं पर आसक्त एक अंद्धे व्यक्ति को अपना नेता अथवा गुरु स्वीकार किया है, वे कभी समझ नहीं सकते कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य है ‘भगवत् धाम को लौटना’ और भगवान विष्णु के सेवारत् होना। जिस प्रकार एक अंधे व्यक्ति के नेत्रित्व में दूसरे अंधे लोग सत मार्ग से भ्रष्ठ होकर नाले में गिर जाते हैं, उसी प्रकार भौतिक्ता में आसक्त व्यक्ति, उसी तरह आसक्त व्यक्तियों के मार्गदर्शन से कर्म पाश मे बंद्ध जाते हैं, जो अति मज़बूत रस्सियों का बना है, और वे पुन: पुन: भौतिक जीवन के तापत्रैयौं (तीन तरह की विपदाओं) का अनुभव करते हैं।”

जो लोग भौतिक जीवन के भोग द्वारा दृढ़ता से बँधे हैं वे नहीं जानते की जीवन का अंतिम और परम लक्ष्य है – ‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री विष्णु’। लोगों ने बाह्य इन्द्रिय – मन, बुद्धि और अहंकार के विषय को अपना मान रखा है। वे सोचते हैं कि ‘मैं शरीर हूँ, मैं इस शरीर का मालिक हूँ।” जैसे किसी ने कमीज या कुर्ता पहन रखा हो और स्वयं को कमीज या कुर्ता ही मानने लगे। हम लोग बाह्य शरीर से ढ़के हुए हैं  और इस बाह्य शरीर के पीछे हमारा वास्तविक अस्तित्व है जो श्री कृष्ण का एक अंश होना है। हम कृष्ण के अंश हैं  और हमें आध्यात्मिक आहार चाहिए, आध्यात्मिक जीवन चाहिए, तभी हम सुखी हो सकते हैं। यदि कोई सोचे की अच्छे भोजन से, अच्छी नेद्रा से, अथवा अच्छी इन्द्रिय तृप्ति से हम सुखी हो पाएंगे तो वह एक भ्रम है।

अब प्रश्न उठता है आखिर लोगों की सोच ऐसी क्यों है? प्रह्लाद महाराज कहते हैं-  अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना [श्री० भा० ७.५.३१] क्योंकि  हम लोगों ने ऐसी सभ्यता अपना रखी है जो अन्धे नेता या अन्धे गुरु द्वारा संचालित है। एक अन्धा कई अन्धे लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। ऐसे अन्धे उन अनेक अन्धे अनुयायियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं जिन्हे भौतिक दशाओं  का सही ज्ञान नहीं है किन्तु ऐसे लोग प्रह्लाद महाराज जैसे भक्तों दरा स्वीकार नहीं किये जाते हैं। तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धा [श्री० भा० ७.५.३१] ऐसे अन्धे गुरु बाह्य भौतिक जगत में रूचि रखने के कारण सदैव प्रकृति की मजबूत रस्सियों द्वारा बँधे रहते हैं। जैसे यदि कोई अन्धा व्यक्ति सड़क किनारे खड़ा हो और अन्य लोगों को कहे कि यदि सब उसका अनुसरण करें तो वह उनको सड़क पार करा देगा, तो परिणाम क्या होगा? परिणाम यही होगा की वे सब किसी नाले में जा गिरेंगे  अथवा किसी गाड़ी से ट़करा कर घायल हो जाएँगे।

वास्तव में हमने भौतिक प्रगती की है परंतु यही विकास हमारी व्यथा का कारण बन गया है। उदाहरणस्वरुप – कंप्यूटर मशीन। यह हजारों लोगों का काम अकेले कर सकती है परंतु इस कारणवश हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसी को कहते है ‘सांसारिक जीवन की उलझन’।  इसका अर्थ यह नहीं है की सारे काम बंद कर दिए जाएँ, किंतु हमे समझना चाहिए कि भौतिक संसार ऐसा है जहाँ किसी समस्या के समाधान से कईं नई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हें। हमारा जीवन समस्याओं को सुलझाने या समस्याओं को उत्पन्न  करने के लिए नहीं बना है हमारा जीवन ईश्वर को समझने के  लिए बना है। जो लोग नहीं पहचान पाते की हम सब प्रकृति के कड़े नियमों में बँधे हैं, उन्हें बदलना कठिन है।

अगला प्रश्न उठता है कि लोग कृष्ण भावनामृत में रूचि नहीं दिखा रहे हों, वे अंधे नेता या गुरु द्वारा गुमराह कर दिए गए हों, तो इस परिस्थिति का समाधान क्या है?

प्रह्लाद महाराज कहते हैं –

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थ:।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥
[श्री० भा​० ७.५.३२]
“जब तक भौतिक जिवन के आसक्त लोग एक पवित्र, सांसारिक दूषण से पूर्णतय: मुक्त वैष्णव की चरण रज से नहा न लें तब तक वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान, जिनकी असाधारण लीलाओं का सदैव गुणगान होता है, उनके चरण कमलों के अनुरक्त नहीं हो सकते। केवल कृष्ण भावनामृत में आकर इस प्रकार भगवान के चरण कमलों का आश्रय स्वीकार कर के ही कोई भौतिक मलिनता से मुक्त हो सकता है।”

इसलिए हमें शुद्ध भक्त की शरण लेने की आवश्यकता है और सिर्फ यही एक मार्ग है। हमे उस व्यक्ति से निर्देश लेना होगा जो अन्धा नहीं है अर्थात जिसकी आँखे खुली हुई हैं जो सांसारिक बंधन से मुक्त है।

कोई कृष्ण को तब तक नहीं समझ सकता जब तक उस पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की कृपा न हो। जिसने कृष्ण के शुद्ध भक्त की शरण ली हो और उनके चरण कमलों की धूलि धारण की हो वही कृष्ण को समझ सकता है। भगवत धाम जाने का यही एक मार्ग है।

   इस प्रकार प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता को यह दिव्य उपदेश किया तो उसे ग्रहण करने के बदले हिरण्यकशिपु के होंठ क्रोध से फड़फड़ाने लगे। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को अपनी गोद से उतार फेंका और अत्यंत क्रुद्ध, पिघले ताँबे जैसे लाल-लाल आँख किये  कहा- “क्या विष्णु इस खम्भे में भी है ?” प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया- “वे तो सर्वव्यापी हैं और इस खम्भे में भी हैं।”  क्रोध से प्रमत्त हिरण्यकशिपु  ने जब खम्भे पर मुठ्ठी से प्रहार किया तो उससे एक भीषण ध्वनि उत्पन्न हुई। पहले तो हिरण्यकशिपु को खम्भे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखा किन्तु प्रह्लाद महाराज के वचन को सत्य करने के लिए भगवान् उस खम्भे से नृसिंह देव के अद्भुत रूप में प्रकट हुए, जिनका आधा अंग सिंह का और आधा अंग मनुष्य का था। जिस प्रकार गरुड़ किसी अत्यंत विषैले सर्प को पकड़ लेता है उसी तरह अट्टहास करते हुए नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु  को अपनी गोद में दबोचा और जिस त्वचा को इन्द्र का वज्र भी नहीं फाड़ सकता था उसे अपने नाखुनों से फाड़ डाला  I

श्री कृष्ण ने भगवद्गीता मे स्पष्ट रूप से कहा है कि “भौतिक प्रकृति मेरी अध्यकक्षता  में काम करती है” (मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् [भ० गी० ९.१०])। लेकिन नास्तिक लोग अपने ईश्वर विहीन स्वभाव के कारण नहीं जान पाते की प्रकृति किस तरह से काम करती है और न ही वे  ईश्वर  की योजना को ही समझ पाते हैं। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से वरदान लिया था की वह न जल में मरे, ने भूमि पर या आकाश में, न दिन में मरे न रात में, न कोई  मनुष्य उसे मार सके न देवता न पशु। वर प्राप्त कर उसने सोचा की वह अमर हो गया। अपनी आसुरी शक्तियों और तामसिक बुद्धि के अहंकार में वह स्वयं को ईश्वर समझने लगा। वह श्री कृष्ण को समर्पित न हो कर स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को ही मारने की योजना बनाने लगा।  लेकिन ऐस तामसिक लोगों की योजना सदा ही श्री कृष्ण की योजना के समक्ष विफल होती है। ऐसे नास्तिक और ईश्वर विहीन लोगों को मारने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ‘मृत्यु ‘ के रूप में आते हैं। “मृत्युः सर्वहरश्हचाहम् …(भ० गी० १०.३४ ) और उनका कीर्ति, धन, परिवार,ऐश्वर्य सब कुछ हर लेते हैं।


जब नृसिंह भगवान प्रकट हुए तो वो बहुत भयंकर लग रहे थे  जिसको अल्प शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता है।  उनके गर्जना से सारे  हाथी भय से चिंघाडने लगे। यहाँ तक कि नारायण की  चिरसंगिनी, लक्षमीजी को भी उनके सम्मुख आने का साहस नहीं हुआॊ। किन्तु, प्रह्लाद महाराज ऐसे भयानक रूप से तनिक भी विचलित नहीं हुए और निश्चिंत उनके चरणों की शरण ली जैसे सिंह का बच्चा सिंह से भयभीत नहीं होता है  बल्कि उछल कर उसके गोद में  जा बैठता है।


भगवान नृसिंह का भयंकर रूप अभक्तों के लिए निश्चय ही अत्यंत घातक था परन्तु भक्तों के लिए यह रूप सदैव कल्याणकारी होता है। समुद्र का जल स्थल के समस्त जीवों के लिए अत्यंत भयावह होता है लेकिन सागर में रहने वाली एक छोटी सी मछली उसमे निर्भय विचरण करती है। क्यों? बड़े बड़े हाथी तक सागर में बह जाते है, किन्तु छोटी मछली धारा के विरुद्ध तैरती रहती है क्योंकि मछली ने धारा की शरण ले रखी है। अतएव यद्यपि दुष्कृत लोगों को मारने के लिए भगवान कभी- कभी भयानक रूप धारण कर लेते हैं किंन्तु भक्त जन उन्हें सदा पूजते हैं।


हर कोई अपने कर्म फल के अनुरूप ही जन्म पाता है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि यदि पिता नास्तिक है तो पुत्र भी नास्तिक ही  होगा।

हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवन ने प्रह्लाद महाराज से कहा, “हर जीव की इच्छा को पूरा करना मेरी लीला है,  इसलिए तुम मुझसे कोई मनवांछित वर मांग सकते हो। हे प्रह्लाद! तुम मुझसे यह जान लो: जो विभिन्न भावों द्वारा मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न करते है मैं उसकी सारी इच्छाओं को पूर्ण कर सकता हूँ।”

भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज ने कहा-” हे सवश्रेष्ठ वर दाता! यदि आप मुझे कोई वर देना चाहते हैं तो मेरी आपसे प्रार्थना है की मेरे ह्रदय के अंतराल में किसी प्रकार की भौतिक इक्छा न रहे ” 

नृसिंह भगवन ने प्रह्लाद महाराज से अत्यंत प्रसन्न हो कर कहा-“हे प्रह्लाद! इस भौतिक जगत में रहते हुए तुम सुख का अनुभव करके अपने पुण्यकर्म को समाप्त कर सकोगे और पुण्य कर्म करके पापकर्मों को विनष्ट कर सकोगे। शक्तिशाली काल के कारण तुम अपने शरीर का त्याग करोगे और बंधन से मुक्त हो कर भगवतधाम लौट सकोगे।”

प्रह्लाद महाराज ने कहा -“हे परमेश्वर ! चूँकि आप पतित आत्माओं पर दयालु हैं अतएव  मैं आपसे एक ही वर मांगता हूँ की मेरे पिता के पापों को क्षमा कर दें।”

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहा -“हे परम भक्त प्रह्लाद! न केवल तुम्हारे पिता अपितु तुम्हारे परिवार के इक्कीस पुर्खों को पवित्र कर दिया गया है। चूँकि तुम इस परिवार में उत्पन्न हुए हो,  तुम्हारा संपूर्ण कुल ही पवित्र हो गया है।”


एक बालक जो कृष्ण भावनामृत में होता है वह अपने पिता, परिवार और देश तथा समाज को सबसे अच्छी सेवा प्रदान करता है। कृष्ण भावनामृत से श्रेष्ठ भला क्या सेवा हो सकती है? यदि किसी वैष्णव का परिवार में जन्म होता है तो वह न केवल अपने पिता को, बल्कि अपने  पिता के पिता, उनके पिता इस तरह इक्कीस पीढ़ी को मुक्ति प्रदान करता है। कृष्ण भावनामृत  में आना परिवार की सर्वश्रेष्ठ सेवा है।