मंगलवार, 9 मई 2017

नृसिंह: अर्ध सिंह, अर्ध मनुष्य

नृसिंह चतुर्दशी के दिन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने अर्ध सिंह, अर्ध मनुष्य के रूप में अवतार लिया था।




 जैसा की श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है –

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्य्हम् ।। [ भ० गी० ४.७]

“हे भरतवंशी! जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ।”


परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।। [भ० गी० ४.८]

“भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की पुन: स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।”

भगवान श्री कृष्ण के नृसिंह अवतार लेने के दो उद्देश्य थे – पहला , अपने भक्त प्रह्लाद का उद्धार करना और दूसरा, दुष्टों  का  विनाश करना।

‘प्रह्लाद’ का शाब्दिक अर्थ है –
 “पराकाष्ठा रूपेण आह्लाद” अर्थात् सदा आनंद से परिपूर्ण।

यह सारी कथा भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज और उनके नास्तिक और निर्दयी पिता हिरण्यकशिपु के बीच मतभेद पर आधारित हैI प्रह्लाद महाराज सिर्फ पाँच वर्ष के बालक थे और उनका अपराध क्या था? सिर्फ इतना की वह कृष्ण भक्त थे और ‘हरे कृष्ण’ का जाप करते थे। पर उनके पिता इतने निर्दयी थे की वे अपने पुत्र की भक्ति से क्रोधित थे।

‘हिरण्यकशिपु ‘ का शाब्दिक अर्थ है – “जो स्वर्ण और मखमल के सेज के प्रति आसक्त हो “, जो की सांसारिक लोगों  का परम लक्ष्य है। उसने अपने पुत्र को कई तरह से प्रताड़ित किया। दानव सदैव भगवान के भक्तों  के विरुद्ध होते है। हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद महाराज को विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करने के बाद भी उनको कृष्ण भक्ति के मार्ग से भ्रमित न कर पाया।

एक दिन उसने अपने पुत्र को बुला कर स्नेहपूर्वक गोद में उठा लिया और फिर उससे पूछा की “अब तक तुमने अपने अध्यापकों से कौन सी सर्वश्रेष्ठ बात सीखी?”  तो प्रह्लाद महाराज ने बताया –

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्र्चेन्नवक्षणा ।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्।।

[श्री० भा० ७.५.२३-२४]

अर्थात्  “हमें श्री विष्णु के दिव्य नाम, रूप, गुण, आभूषण एवं सेवा सामग्री तथा लीलाओं के बारे में सुनना, कीर्तन करना, स्मरण करना, उनके चरणों की सेवा करना, शोडशोपचार पूजा करना, वंदना करना, उनके सेवक बनना, उनको अपना मित्र मानना और उनको सर्वस्व समर्पण करना (अर्थात काया, वाचा, मनसा उनकी सेवा में लिन रहना) – यह नव विधान शुद्ध भक्ति कहलाते हैंI जिस व्यक्ति ने अपने जीवन को श्री कृष्ण की भक्ति में इन नव विधानों द्वारा समर्पित किया हो उसको सबसे विद्वत्त समझना चाहिए क्योंकि उसने सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित कर लिया है।”

अपने पुत्र प्रह्लाद के मुख से भक्ति के इन वचनों को सुन कर हिरण्यकशिपु अत्यंत क्रोधित हुआ। उसने कँपकँपाते होठों से गुरु शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड से इस प्रकार कहा,”अरे ब्राह्मण के अयोग्य नृशंस पुत्र! तुमने मेरे बालक को भक्ति का पाठ पढ़ाया है?” गुरु शुक्राचार्य के पुत्र ने बताया की उसने या किसी ने उसे यह नहीं पढ़ाया है। उसमे यह भक्ति स्वतः उत्पन्न हुई है। हिरण्यकशिपु ने तब अपने पुत्र से कहा, ” रे धूर्त! हमारे परिवार के सबसे अधम! यदि तुमने यह शिक्षा अध्यापकों से नहीं प्राप्त की तो कहाँ से प्राप्त की?” प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया,

श्रीप्रह्राद उवाच
मतिर्न कृष्णे परत: स्वतो व
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं
पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम् ।।
[श्री० भा० ७.५.३०]
“प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया, अनियंत्रित इंद्रियों के कारण वे व्यक्ति जो भौतिक जीवन से अति मोहित हैं वह चबाये हुए को चबाते नर्क की ओर अग्रसर हैं। दूसरों के बोधन से, अपने प्रयासों से अथवा इन दोनों के मिश्रित प्रभाव से भी उनमें श्री कृष्ण के प्रति आसक्ति कभी जागृत नहीं होती।”

दो शब्द हैं – एक गृहस्थ और दूसरा गृहव्रत अथवा गृहमेधी। क्योंकि प्रह्लाद अपने पिता की ओर इशारा कर रहा था की वह गृहव्रत है, तो उसने कहा – यदि भौतिक संसार में इस शरीर के साथ कोई सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता हैं तो वह आत्म चिंतन से अथवा सम्मेलन द्वारा ही कभी भी कृष्ण भावनामृत में नहीं आ सकते। ऐसे व्यक्तियों की स्थिति क्या होती है? अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं… वे अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रख पाते अत: उनका मार्ग उन्हें नारकीय जीवन की ओर ले जाता है। उनका मात्र एक कर्म होता है- पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम्… चबाये हुए को चबाना।

सांसारिक सुख का अर्थ है -चबाये हुए को पुन: चबाना। जिस प्रकार एक पिता यह जनता है की उसने विवाह कर परिवार को सुखपूर्वक जीवन प्रदान करने भरसक प्रयास किया पर अंतत: सभी अतृप्त रहे, फिर भी वह अपनी संतान को इसी कार्यकलाप में संलग्न करता है। स्वयं का इस सांसारिक जीवन में बहुत बुरा अनुभव होने के उपरांत भी वह अपनी संतान को सांसारिक सुखों के पीछे भागना सिखाता है। इसी को कहते है ‘पुन: पुनश्र्चर्वितचर्वणानाम्’। यह वही परिस्थिति जैसे गन्ने  को कोई चबाए और सारा रस निकाल कर फ़ेंक दे और इस चबाए हुए गन्ने को फिर चबा कर रस निकालना चाहे।

सांसारिक सुख का अर्थ है -‘संभोग’ जो यहाँ का अंतिम और चरम सुख है। जो व्यक्ति इन्द्रिय सुख की ओर बहुत आकर्षित रहते हैं वे निष्कर्ष निकाल लेते हैं की हम परिवार और समाजिक जीवन में ही सुखी रह सकते हैं और सुख में स्त्री और बच्चों का होना अनिवार्य है। ऐसे जीवन में अवश्य कुछ आनंद है परंतु शासत्रानुसार, इसकी मान्यता क्या है?

श्रील विद्यापति ठाकुर अपने एक गीत में लिखते हैं,

तातल सैकते वारिबिंदुसम सुतमितरमणिसमाजे

निः संदेह गृहस्थ जिवन में कुछ आनंद अवश्य होगा अन्यथा इतने लोग इसके लिए क्यों व्याकुल हैं। किंतु यह आनंद तुच्छ और क्षणिक है। इस आनंद की तुलना मरुस्थल में जल बिंदु से की गई है। यदि हम मरुस्थल को बगीचा बनाना चाहें तो उसके लिए एक समुद्र भर जल की आवश्यक्ता होगी। यदि कोई यह कहे की ‘तुम्हे पानी चाहिए? एक बूँद ले लो’, तो यह बात हास्यप्रद होगी? उसी प्रकार यदि हमारा मन भौतिक अभिलाषाओं में मग्न है, तो वह इस मरुभूमि रूपि संसार में एक बूंद के प्रति आसक्त होना है। इसमे दीर्धकिलीन सुख का कोई आसार नहीं है।

वास्तव में हम कृष्ण के  प्रति आतुर हैं किंतु इस इच्छा से अनभिज्ञ हैं। हम अपनी इच्छाओं को संसार की भौतिक वस्तुओं से संतुष्ट करना चाहते है जो असंभव है। हम आशा के विरुद्ध आशा करते हैं।  जिस प्रकार यदि किसी मछली को पानी से बाहर निकाल कर एक बहुत सुंदर सेज पर लेटा दिया जाये तो वह कभी खुश नहीं रह सकती। उसी प्रकार जीवात्मा जब तक अपने स्वभावानुसार आध्यात्मिक वातावरण में विचरण नहीं करती, वह सुखी नहीं हो सकती।  इसी कारण वश जगत में हर कोई निराश व परेशान है।

अगला प्रश्न यह उठता है कि आखिर लोग इस भौतिक जीवन के भोग के लिेए क्यों इतने व्याकुल हैं? इस प्रश्न का उत्तर  प्रह्लाद महाराज देते हैं –

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिरर्थमानिनः।
अन्धा यथान्धैरुपनीयामाना-
स्तेपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धा ।।
[ श्री० भा० ७.५.३१]
“जो व्यक्ति दृढ़ रुप से भौतिक सुख की कामना में बद्ध हैं, अथ: जिन्होंने अपने समान बाह्य वस्तुओं पर आसक्त एक अंद्धे व्यक्ति को अपना नेता अथवा गुरु स्वीकार किया है, वे कभी समझ नहीं सकते कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य है ‘भगवत् धाम को लौटना’ और भगवान विष्णु के सेवारत् होना। जिस प्रकार एक अंधे व्यक्ति के नेत्रित्व में दूसरे अंधे लोग सत मार्ग से भ्रष्ठ होकर नाले में गिर जाते हैं, उसी प्रकार भौतिक्ता में आसक्त व्यक्ति, उसी तरह आसक्त व्यक्तियों के मार्गदर्शन से कर्म पाश मे बंद्ध जाते हैं, जो अति मज़बूत रस्सियों का बना है, और वे पुन: पुन: भौतिक जीवन के तापत्रैयौं (तीन तरह की विपदाओं) का अनुभव करते हैं।”

जो लोग भौतिक जीवन के भोग द्वारा दृढ़ता से बँधे हैं वे नहीं जानते की जीवन का अंतिम और परम लक्ष्य है – ‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री विष्णु’। लोगों ने बाह्य इन्द्रिय – मन, बुद्धि और अहंकार के विषय को अपना मान रखा है। वे सोचते हैं कि ‘मैं शरीर हूँ, मैं इस शरीर का मालिक हूँ।” जैसे किसी ने कमीज या कुर्ता पहन रखा हो और स्वयं को कमीज या कुर्ता ही मानने लगे। हम लोग बाह्य शरीर से ढ़के हुए हैं  और इस बाह्य शरीर के पीछे हमारा वास्तविक अस्तित्व है जो श्री कृष्ण का एक अंश होना है। हम कृष्ण के अंश हैं  और हमें आध्यात्मिक आहार चाहिए, आध्यात्मिक जीवन चाहिए, तभी हम सुखी हो सकते हैं। यदि कोई सोचे की अच्छे भोजन से, अच्छी नेद्रा से, अथवा अच्छी इन्द्रिय तृप्ति से हम सुखी हो पाएंगे तो वह एक भ्रम है।

अब प्रश्न उठता है आखिर लोगों की सोच ऐसी क्यों है? प्रह्लाद महाराज कहते हैं-  अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना [श्री० भा० ७.५.३१] क्योंकि  हम लोगों ने ऐसी सभ्यता अपना रखी है जो अन्धे नेता या अन्धे गुरु द्वारा संचालित है। एक अन्धा कई अन्धे लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। ऐसे अन्धे उन अनेक अन्धे अनुयायियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं जिन्हे भौतिक दशाओं  का सही ज्ञान नहीं है किन्तु ऐसे लोग प्रह्लाद महाराज जैसे भक्तों दरा स्वीकार नहीं किये जाते हैं। तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धा [श्री० भा० ७.५.३१] ऐसे अन्धे गुरु बाह्य भौतिक जगत में रूचि रखने के कारण सदैव प्रकृति की मजबूत रस्सियों द्वारा बँधे रहते हैं। जैसे यदि कोई अन्धा व्यक्ति सड़क किनारे खड़ा हो और अन्य लोगों को कहे कि यदि सब उसका अनुसरण करें तो वह उनको सड़क पार करा देगा, तो परिणाम क्या होगा? परिणाम यही होगा की वे सब किसी नाले में जा गिरेंगे  अथवा किसी गाड़ी से ट़करा कर घायल हो जाएँगे।

वास्तव में हमने भौतिक प्रगती की है परंतु यही विकास हमारी व्यथा का कारण बन गया है। उदाहरणस्वरुप – कंप्यूटर मशीन। यह हजारों लोगों का काम अकेले कर सकती है परंतु इस कारणवश हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसी को कहते है ‘सांसारिक जीवन की उलझन’।  इसका अर्थ यह नहीं है की सारे काम बंद कर दिए जाएँ, किंतु हमे समझना चाहिए कि भौतिक संसार ऐसा है जहाँ किसी समस्या के समाधान से कईं नई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हें। हमारा जीवन समस्याओं को सुलझाने या समस्याओं को उत्पन्न  करने के लिए नहीं बना है हमारा जीवन ईश्वर को समझने के  लिए बना है। जो लोग नहीं पहचान पाते की हम सब प्रकृति के कड़े नियमों में बँधे हैं, उन्हें बदलना कठिन है।

अगला प्रश्न उठता है कि लोग कृष्ण भावनामृत में रूचि नहीं दिखा रहे हों, वे अंधे नेता या गुरु द्वारा गुमराह कर दिए गए हों, तो इस परिस्थिति का समाधान क्या है?

प्रह्लाद महाराज कहते हैं –

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थ:।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥
[श्री० भा​० ७.५.३२]
“जब तक भौतिक जिवन के आसक्त लोग एक पवित्र, सांसारिक दूषण से पूर्णतय: मुक्त वैष्णव की चरण रज से नहा न लें तब तक वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान, जिनकी असाधारण लीलाओं का सदैव गुणगान होता है, उनके चरण कमलों के अनुरक्त नहीं हो सकते। केवल कृष्ण भावनामृत में आकर इस प्रकार भगवान के चरण कमलों का आश्रय स्वीकार कर के ही कोई भौतिक मलिनता से मुक्त हो सकता है।”

इसलिए हमें शुद्ध भक्त की शरण लेने की आवश्यकता है और सिर्फ यही एक मार्ग है। हमे उस व्यक्ति से निर्देश लेना होगा जो अन्धा नहीं है अर्थात जिसकी आँखे खुली हुई हैं जो सांसारिक बंधन से मुक्त है।

कोई कृष्ण को तब तक नहीं समझ सकता जब तक उस पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की कृपा न हो। जिसने कृष्ण के शुद्ध भक्त की शरण ली हो और उनके चरण कमलों की धूलि धारण की हो वही कृष्ण को समझ सकता है। भगवत धाम जाने का यही एक मार्ग है।

   इस प्रकार प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता को यह दिव्य उपदेश किया तो उसे ग्रहण करने के बदले हिरण्यकशिपु के होंठ क्रोध से फड़फड़ाने लगे। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को अपनी गोद से उतार फेंका और अत्यंत क्रुद्ध, पिघले ताँबे जैसे लाल-लाल आँख किये  कहा- “क्या विष्णु इस खम्भे में भी है ?” प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया- “वे तो सर्वव्यापी हैं और इस खम्भे में भी हैं।”  क्रोध से प्रमत्त हिरण्यकशिपु  ने जब खम्भे पर मुठ्ठी से प्रहार किया तो उससे एक भीषण ध्वनि उत्पन्न हुई। पहले तो हिरण्यकशिपु को खम्भे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखा किन्तु प्रह्लाद महाराज के वचन को सत्य करने के लिए भगवान् उस खम्भे से नृसिंह देव के अद्भुत रूप में प्रकट हुए, जिनका आधा अंग सिंह का और आधा अंग मनुष्य का था। जिस प्रकार गरुड़ किसी अत्यंत विषैले सर्प को पकड़ लेता है उसी तरह अट्टहास करते हुए नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु  को अपनी गोद में दबोचा और जिस त्वचा को इन्द्र का वज्र भी नहीं फाड़ सकता था उसे अपने नाखुनों से फाड़ डाला  I

श्री कृष्ण ने भगवद्गीता मे स्पष्ट रूप से कहा है कि “भौतिक प्रकृति मेरी अध्यकक्षता  में काम करती है” (मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् [भ० गी० ९.१०])। लेकिन नास्तिक लोग अपने ईश्वर विहीन स्वभाव के कारण नहीं जान पाते की प्रकृति किस तरह से काम करती है और न ही वे  ईश्वर  की योजना को ही समझ पाते हैं। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा जी से वरदान लिया था की वह न जल में मरे, ने भूमि पर या आकाश में, न दिन में मरे न रात में, न कोई  मनुष्य उसे मार सके न देवता न पशु। वर प्राप्त कर उसने सोचा की वह अमर हो गया। अपनी आसुरी शक्तियों और तामसिक बुद्धि के अहंकार में वह स्वयं को ईश्वर समझने लगा। वह श्री कृष्ण को समर्पित न हो कर स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को ही मारने की योजना बनाने लगा।  लेकिन ऐस तामसिक लोगों की योजना सदा ही श्री कृष्ण की योजना के समक्ष विफल होती है। ऐसे नास्तिक और ईश्वर विहीन लोगों को मारने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ‘मृत्यु ‘ के रूप में आते हैं। “मृत्युः सर्वहरश्हचाहम् …(भ० गी० १०.३४ ) और उनका कीर्ति, धन, परिवार,ऐश्वर्य सब कुछ हर लेते हैं।


जब नृसिंह भगवान प्रकट हुए तो वो बहुत भयंकर लग रहे थे  जिसको अल्प शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता है।  उनके गर्जना से सारे  हाथी भय से चिंघाडने लगे। यहाँ तक कि नारायण की  चिरसंगिनी, लक्षमीजी को भी उनके सम्मुख आने का साहस नहीं हुआॊ। किन्तु, प्रह्लाद महाराज ऐसे भयानक रूप से तनिक भी विचलित नहीं हुए और निश्चिंत उनके चरणों की शरण ली जैसे सिंह का बच्चा सिंह से भयभीत नहीं होता है  बल्कि उछल कर उसके गोद में  जा बैठता है।


भगवान नृसिंह का भयंकर रूप अभक्तों के लिए निश्चय ही अत्यंत घातक था परन्तु भक्तों के लिए यह रूप सदैव कल्याणकारी होता है। समुद्र का जल स्थल के समस्त जीवों के लिए अत्यंत भयावह होता है लेकिन सागर में रहने वाली एक छोटी सी मछली उसमे निर्भय विचरण करती है। क्यों? बड़े बड़े हाथी तक सागर में बह जाते है, किन्तु छोटी मछली धारा के विरुद्ध तैरती रहती है क्योंकि मछली ने धारा की शरण ले रखी है। अतएव यद्यपि दुष्कृत लोगों को मारने के लिए भगवान कभी- कभी भयानक रूप धारण कर लेते हैं किंन्तु भक्त जन उन्हें सदा पूजते हैं।


हर कोई अपने कर्म फल के अनुरूप ही जन्म पाता है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि यदि पिता नास्तिक है तो पुत्र भी नास्तिक ही  होगा।

हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवन ने प्रह्लाद महाराज से कहा, “हर जीव की इच्छा को पूरा करना मेरी लीला है,  इसलिए तुम मुझसे कोई मनवांछित वर मांग सकते हो। हे प्रह्लाद! तुम मुझसे यह जान लो: जो विभिन्न भावों द्वारा मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न करते है मैं उसकी सारी इच्छाओं को पूर्ण कर सकता हूँ।”

भक्त शिरोमणि प्रह्लाद महाराज ने कहा-” हे सवश्रेष्ठ वर दाता! यदि आप मुझे कोई वर देना चाहते हैं तो मेरी आपसे प्रार्थना है की मेरे ह्रदय के अंतराल में किसी प्रकार की भौतिक इक्छा न रहे ” 

नृसिंह भगवन ने प्रह्लाद महाराज से अत्यंत प्रसन्न हो कर कहा-“हे प्रह्लाद! इस भौतिक जगत में रहते हुए तुम सुख का अनुभव करके अपने पुण्यकर्म को समाप्त कर सकोगे और पुण्य कर्म करके पापकर्मों को विनष्ट कर सकोगे। शक्तिशाली काल के कारण तुम अपने शरीर का त्याग करोगे और बंधन से मुक्त हो कर भगवतधाम लौट सकोगे।”

प्रह्लाद महाराज ने कहा -“हे परमेश्वर ! चूँकि आप पतित आत्माओं पर दयालु हैं अतएव  मैं आपसे एक ही वर मांगता हूँ की मेरे पिता के पापों को क्षमा कर दें।”

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ने कहा -“हे परम भक्त प्रह्लाद! न केवल तुम्हारे पिता अपितु तुम्हारे परिवार के इक्कीस पुर्खों को पवित्र कर दिया गया है। चूँकि तुम इस परिवार में उत्पन्न हुए हो,  तुम्हारा संपूर्ण कुल ही पवित्र हो गया है।”


एक बालक जो कृष्ण भावनामृत में होता है वह अपने पिता, परिवार और देश तथा समाज को सबसे अच्छी सेवा प्रदान करता है। कृष्ण भावनामृत से श्रेष्ठ भला क्या सेवा हो सकती है? यदि किसी वैष्णव का परिवार में जन्म होता है तो वह न केवल अपने पिता को, बल्कि अपने  पिता के पिता, उनके पिता इस तरह इक्कीस पीढ़ी को मुक्ति प्रदान करता है। कृष्ण भावनामृत  में आना परिवार की सर्वश्रेष्ठ सेवा है।

सोमवार, 8 मई 2017

सोमवंशी अथवा चंद्रवंशी क्षत्री

Historical Research of 

Real Yaduvanshi  |Pauranik Yadav and Yadukul Shiromane Shre Krishna 's Vanshaj

वास्तविक यदुवंशी/पौराणिक यादवों तथा यदुकुल शिरोमणी भगवान् श्री कृष्ण के वंशजों का ऐतिहासिक शोध ----

आधुनिक वर्तमान  परिवेश में वास्तविक यदुवंशी /पौराणिक यादव (जादौ, जादौन, जडेजा ,भाटी, जादव, वनाफर, चूड़ा शमा, सरवैया, रायजादा, छौंकर, वडेसरी, जसावत, जैसवार, सोहा, मुड़ेचा, पोर्च, बितमन , बरगला, नारा, उरिया आदि) समाज अपने इतिहास, संस्कृति, एवं अस्तित्व से अनभिज्ञ है और वर्तमान समय के चलते जातीय घाल-मेल में दन्त कथाओं और अप्रमाणिक इतिहास को यत्र-तत्र पढ़ कर या सुनकर भ्रमित हो रहा है। किसी ने सत्य ही कहा है 

"जो अपना इतिहास नहीं जानता, वह खुद को भी नहीं जानता"

क्यों कि इतिहास से ही किसी व्यक्ति या समाज की पहचान बनती है।आज संसार की अनेक जातियाँ अपने जातीय इतिहास के ज्ञान के बिना लुप्त हो चुकी है।विद्वान और भागवताचार्य इस यदुवंश की महिमा का वर्णन करते रहते है लेकिन स्वयं यदुवंश समाज आज भी अपने ही गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से अपरिचित तथा भृमित बना हुआ है।जब कि अन्य जातियां यदुवंश के विशेष नामों ,उपनामों तथा महापुरुषों का प्रयोग कर सामाजिक ,राजनैतिक ,एवं आर्थिक लाभ प्राप्त कर रही है।आज कल कुछ जातीय इतिहासकार /लेखक अपनी जाति के इतिहास लेखन में अप्रमाणित ,भर्मपूर्ण एवंकाल्पनिक विवरण लिख रहे है तथा हमारे वास्तविक क्षत्रियों के इतिहास के साथ अपने कल्पित इतिहासको जोड़ने की पूर्ण कोशिस कर रहे हैजिसे पढ़ कर पाठक भर्मित होजाता है।ऐसे भ्रामक ज्ञान से समाज के लोगों में कुतर्कों का जाल फैलता है ।यह भ्रामक छेड़ -छाड़ यदुवंश के विशाल इतिहास के साथ अत्यधिक दृष्टिगोचर है क्यों कि समस्त प्राचीन इतिहास का मूल श्रोत वेद और पुराण है जिनमें यदुवंश का इतिहास विस्तार से वर्णित है।अतीत के ज्ञान विना वर्तमान का सरलीकरण एवं भविष्य का मार्गदर्शन नहीं होता ।
 चन्द्रवंश से यदुवंश का जन्म कैसे हुआ ? 
Birth of yaduvansh from Chandravansh

यदुवंश प्रायः चन्द्रवंश की एक प्रमुख शाखा है।ऋग्वेद में यदुवंशी तथा चंद्रवंशी अनेक राजाओं का वर्णन मिलता है जिनको शुद्ध क्षत्रिय कहा गया है।यदुवंश द्विजाति -संस्कारित है।प्राचीन पौराणिक इतिहास के अनुसार क्षत्रिय राजा ययाति का विवाह दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री (ब्राह्मण कन्या )देवयानी से हुआ था जिसके बड़े पुत्र महाराज यदु थे जिनसे यदुवंश चला ।इसी कारण यदुवंश में उत्पन्न श्री कृष्णा एवंबलराम का यदुवंश के कुलगुरु गर्गाचार्य जी द्वारा वसुदेव जी के कहने पर नन्द गोप ने गोकुल में द्विजाति यज्ञोपवीत नामकरण संस्कार कराया था ।चन्द्रवंश में से यदुवंश का जन्म कैसे हुआ इसका वर्णन इस प्रकार है।
ब्रहमा के पुत्र अत्रि थे।जिनकी पत्नी भद्रा से सोम अथवा चन्द्रमाका जन्म हुआ।इस लिए ये वंश सोम या चंद्र वंश के नाम से जाना गया।अत्रि ऋषि से इस वंश की उत्पती हुई इस लिए इस वंश के वंशजों का गोत्र अत्री माना गया।तथा इस वंश के वंशज चंद्रवंशी या सोमवंशी कहलाये।चंद्रमा जी ब्रह्स्पति जी की पत्नी तारा का चुपचाप हरण कर लाये। उनसे वुद्ध नामक पुत्र पैदा हुआ। उनके शूर्यवंशी मनु की पुत्री इला से पुरुरुवा नाम का पुत्र हुआ। कालान्तर में वे चक्रवर्ती सम्राट हुए। इन्होंने प्रतिस्थानपुर जिसे प्रयाग कहते है बसाया और अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया। राजा पुरुरवा के उर्वशी के गर्भ से आयु आदि6 पुत्र हुए।महाराज आयु केसरभानुया राहु की पुत्रीप्रभा से नहुष आदि 5 पुत्र हुए।महाराज आयु अनेक आर्यों को लेकर भारत की ओर आयेऔर यमुना नदी के किनारे मथुरा नगर बसाया।राजा आयु के बड़े पुत्र नहुष राजा बने।महाराज नहुष के रानी वृजा से 6पुत्र पैदा हुए जिनमे यती सबसे बड़े थे लेकिन वे धार्मिक प्रवर्ती के होने के कारण राजा नही बनेऔर ययाति को राजा बनाया गया।राजा ययाति की दो रानियां थीजिन्मे एक देवयानी जोदैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी तथा दूसरी शर्मिष्ठा जो दानव राज वृषपर्वा की पुत्री थी।देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा से द्रुह्यु अनु और पुरू हुए।सभी पांचों राजकुमार सयुक्त रूप से पाञ्चजन्य कहलाये। राजा ययाति ने अपने बड़े बेटे यदु से उनका यौवन मागा जिसे उन्होंने नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दीया।सबसे छोटे पुत्र पुरू ने अपना यौवन पिता को देदीया।राजा ययाति ने अप्रसन्न होकर युवराज यदु को उनके बीजभूत उत्तराधिकार से वंचित करके कुमार पुरू को यह अधिकार पारतोषिक में देने की घोषणा की।राजा ययाति के पुत्रों में यदु और पुरू के वंशज ही भारतीय इतिहास का केंद्र रहे। बुद्ध और ययाति तक के राजाओं के वंशज हीसोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाये।राजा पुरू के वंशजोंको हीसोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाने का अधिकार था।इस लिए क्यों क़ि यदू कुमार ने यौवन देने से इनकार कर दीया थाइस पर महाराज ययाति ने यदु को श्राप दिया की तुम्हारा कोई वंशज राजा नही बनेगा और तुम्हारे वंशज सोम या चंद्र वंशी कहलाने के अधिकारी नहीं होंगे।केवल राजा पुरू के वंशज ही सोम या चंद्रवंशी कहलायेंगे।इसमे कौरव और पांडव हुए।यदु महाराज ने राजाज्ञा दी की भविष्य में उनकी वंश परंम्परा"यदु या यादव "नाम से जानी जाय और मेरे वंशज"यदुवंशी या यादव"कहलायेंगे।राजा पुरू के वंशज,पौरव या पुरुवंशी ही अब आगे से सोमवंशी या चंद्रवंशी कहलाने के अधिकारी रह गये थे।राजा पुरू ,राजा दुष्यंत के पूर्वज थे जिनके राजकुमार भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत या भारतवर्ष"पड़ा।राजा पुरू के ही वंश मेराजा कुरु हुए जिनके कौरव और पांडव हुए जिनमे आपस में महाभारत युद्ध हुआ। प्रयाग से मध्य-देश पर राज्य करते हुए राजा ययाति अत्यधिक अतृप्त यौनाचार से थक गए इसलिए वृद्धावस्था में राज्य त्याग कर उन्होंने वानप्रस्थ का मार्ग अपनाया और जंगल में सन्यासी का जीवन व्यतीत करने चले गये।भारत में केबल यदु और पुरू की संतती शेष रही और इन्ही के वंशजों ने भारत के भावी भाग्य का निर्माण किया।
 Kul of yadyvanshis /pauranik yadavas kshtriyas 
यदुवंशी / पौराणिक यादव क्षत्रियों के कुल
महाराज यदु के 4 पुत्र हुए जिनमें शाष्ट्राजित और क्रोष्ट्रा के वंशज अधिक प्रशिद्ध हुये ।शाष्ट्राजित के वंशज हैहय यादव कहलाये जो यदु के राज्य के उत्तरी भाग के शासक हुए ।
क्रोष्ट्रा --ये महाराज यदु के बाद प्रथम यदुवंशी शासक हुये जो दक्षिणी भाग यानी जूनागढ़ के शासक हुये ।महाराज क्रोष्ट्रा का कुल आगे चल कर कई उपकुलों में विभाजित हुआ ।जिनका विवरण इस प्रकार है। 
अ --राजा दर्शाह के वंशज दर्शाह यादव कहलाये । 
ब -राजा मधू के वंशज मधु यादव कहलाये । 
स-राजा सात्वत के वंशज सात्वत यादव कहलाये । 
द-राजा वृष्णी के वंशज वृष्णी यादव कहलाये जिनमें शूरसेन ,वासुदेव ,श्री कृष्ण ,अक्रूर ,उद्धव ,सात्यकी , कुन्ती ,सत्यभामाके पिता सत्राजित हुये । 
ध- राजा अंधक महाभोज के वंशज भोज वंशी यादव कहलाये जिनमे कुकर -के वंश में राजा उग्रसैन और देवक हुए और भजमन के वंश में कृतवर्मा और सतधनवा हुआ । 
न-कौशिक वंश के यादवों में चेदिराज दमघोष हुए जिनका पुत्र शिशुपाल हुआ । 
प -विदर्व वंशी यादवों में राजा भीष्मक हुए जिनकी पुत्री रुक्मणी जी थी ।
विष्णु पुराण के अनुसार दानवों का नाश करने के लिए देवताओं ने यदुवंश में जन्म लिया जिसमें कि 101 कुल थे।उनका नियंत्रण और स्वामित्व भगवान् श्री कृष्ण ने खुद किया (वि0 पु0 पेज 299) ।महाभारत में 56 कोटि यादवों का वर्णन आता है।इससे लोग अनुमान करते है कि 56 करोड़ यदुवंशी या यादव क्षत्रिय थे परंतु वास्तव में यह 56 शाखाएं थी जिन्हें कुल कहते है।इस लिए 56 करोड़ यादव क्षत्रिय मानना भूल है।मेजर अरसेकिंन साहिब ने भी राजपुताना गजेटियर सन् 1908 में यादव क्षत्रियों के 56 तड़नें या कुल माने है ।वायुपुराण के अनुसार यदुवंशियों के 11कुल कहे जाते है ।"कुलानि दश चैकं च यादवानाम महात्मनां " ।यदुवंश में यादव कुमारों को शिक्षा देने वाले आचार्यों की संख्या 3करोड़ 88 लाख थी फिर उन महात्मा यादवों की गणना कौन कर सकता था ।राजा उग्रसैन के साथ 1 नील के लगभग यदुवंशी सैनिक थे (श्रीमद्भभागवत पेज 598 )।चंद्रमा से श्री कृष्ण के समय तक कुल 46 राजाओं की पीढ़ीया हुई।भगवान् श्री राम कृष्ण जी से 21 पीढ़ी पहले हुये थे ।महाराज यदु की वंश में 42 पीढ़ी बाद वृष्णी राजा हुएजिनके पुत्र देवमीढुश हुये जिनकी अश्मकी नामक पत्नी से महाराज शूरसेन हुये जिनके मारिषा नाम की पत्नी से वासुदेव आदि 10 पुत्र व् कुन्ती आदि 5 पुत्रियां हुई ।वासुदेव जी की पत्नी देवकी जी जो अंधक वंशी यादव उग्रसैन के भाई देवक की पुत्री थीसे भगवान् श्री कृष्ण हुए ।कुछ जाति विशेष के इतिहासकारों ने अहीरों या गोपों के शासक नन्द जी को यदुवंशियों से जोड़ने के प्रयाश में श्री कृष्ण के 4पीढ़ी पूर्व देवमीढु यदुवंशी राजा की क्षत्रिय पत्नी जो इक्ष्वाकु वंश की राजकुमारी अश्मकी थी उससे महाराज शूरसेन पैदा हुए जिनके वासुदेव जी थे और देवमीढुश की वैश्य जाति की पत्नी से पर्जन्य उत्पन्न हुए जिनके पुत्र नन्द जी हुये जिनसे अहीर या गोप अपनी उत्तपति बताते है जो बिलकुल असत्य है जिसका कोई उल्लेख पौराणिक साहित्य या इतिहास में नही मिलता है ।ऐसे में पर्जन्य की उत्तपति एक मिथक प्रयास कहा जासकता है ।इस सम्बन्ध में पौराणिक एवं ऐतिहासिक कोई भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता जिससे यह प्रमाणित हो सके कि अहीर जाति राजा यदु से उत्पन्न यदुवंश में उत्पन्न है ।आधुनिक देशी व् विदेशी इतिहासकारों ने भी इस जाति का यदु के वंश से कोई सम्वन्ध नही बताया है ।और नही भगवान् कृष्ण के किसी वंशज से इनका सम्वन्ध है। पूर्व काल से ही गोपों और यदुवंशी क्षत्रियों का सामजिक जीवन भिन्न रहा है।इतिहास का अध्ययन व् चिंतन किये बिना कोई कुछ भी लिख दे तो वही सत्य नहीं माना जासकता है।आजकल व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षा के लिए सत्य को भुला कर असत्य की खोज करने में लगरहा है।
श्रीमद्वाभागवत और अन्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार वर्णन मिलता है कि श्री कृष्ण और बलराम के नामकरण संस्कार कराने के लिए वासुदेव जी ने यदुवंशियों के कुलगुरु महर्षि गर्गाचार्य को गोकुल में भेजा था जिन्होंने कंश के भय से गौशाला में छिप कर गर्गाचार्य जी नामकरण संस्कार कराया था ।यह रहस्य नन्द गोप ने अपने अन्य भाई बन्ध गोपों से भी छिपाया था ।यदि नन्द जी यदुवंश में उत्पन्न होते तो वे कृष्ण और बलराम जी का नामकरण अपने कुल गुरु महर्षि शाडिंलया से क्यों नहीं कराया ।क्यों कि एक ही वंश के दो कुलगुरु नहीं होसकते ।गर्गाचार्य जी को सम्पूर्ण श्रेष्ठ यादवों ने महाराज शूरसेन की इच्छा से मथुरापुरी में अपने पुरोहित पद पर प्रतिष्ठित किया था ।उस समय उग्रसेन मथुरा के राजा थे।गर्ग जी की इच्छा से ही वासुदेव और देवकी जी का विवाह हुआ था ।महावन में नंदपत्नी के गर्भ से योगमाया ने स्वतः जन्म ग्रहण किया था ।यशोदा जी को गोपी कहा गया है (गर्ग स0 पेज 30 ) ।नन्द जी ब्रज में शोणपुर के शासक थे।नन्द जी ने खुद कहा है कि मैं तो व्रजवासी गोप -गोपियों का आज्ञाकारी सेवक हूँ वरजेश्वर नंदराय जी कहते थे उनको सभी व्रजवासी ।नन्द जी और वासुदेव जी ने हमेशा हर जगह जहाँ भी मिले है एक दूसरे को मित्र ही कहा है सगे संबंधी नही ।
श्री कृष्ण की 8 पटरानी थी जिनमे रुक्मणी ,सत्यभामा ,कालिंदी ,सत्या , मित्रविन्दा ,भद्रा ,लक्ष्मणा ,और जामवंती ।इसके अलावा श्री कृष्ण जी ने नरकासुर के वंदी घर से लाई हुई 16100 कन्याओं से भी एक ही लग्न में विविधकाय हो कर विवाह किया और प्रत्येक कन्या से वाद में एक -एक कन्या व् दस -दस पुत्र हुए।इसके आलावा 8 पटरानियों से भी दस -दस पुत्र और एक -एक कन्या हुई।इस प्रकार भगवान् श्री कृष्ण के कुल 1लाख 70 हजार 1 सौ 88 संतानें थी जिनमें प्रधुम्न ,चारुदेशन ,और शाम्ब आदि 13 पुत्र प्रधान थे ।प्रधुम्न ने रुक्मी की पुत्री रुक्मवती से विवाह किया जिससे अनिरुद्ध जी पैदा हुए ।अनिरुद्ध जी ने भी रुक्मी की पौत्री सुभद्रा से बिवाह किया जिससे यदुकुल शिरोमणी यदुवंश प्रवर्तक श्री वज्रनाभ जी पैदा हुए ।वज्रनाभ जी के पुत्र प्रतिवाहु ,प्रतिवाहु के सुवाहू ,सुबाहु के शांतसेन् और शांतसेन् के शतसेन हुये ।यहाँ से ये यदुवंश या यादव वंश फिर अनेक शाखाओं और उपशाखाओं जैसे जादौन ,जडेजा ,भाटी ,चुडासमा ,सरवैया ,छौंकर ,जादव ,रायजादा ,बरेसरी ,जसावत ,जैसवार ,वनाफ़र ,बरगला ,यदुवंशी ,सोहा ,मुड़ेचा ,सोमेचा ,बितमन ,नारा ,पोर्च ,उरिया ,आदि में विभाजित होगया ।सन् 1900 के दशक तक यदुवंस के लोग यदुवंशी या यादव सरनेम लिखते थे ।कुछ इतिहासकारों ने बाद में यदु या यादव का अपभ्रंश जदु ,जादव ,जादों या जादौन कर दिया जो बाद में प्रचलन में आया ।महाकवि तुलसीदास जी ने रामायण में यदु वंश को जदुवंश कहा है ।
दुसरा प्रमाण यह है कि भगवान् श्री कृष्ण ने जरासंध के बार बार आक्रमण करने पर ब्रजमंडल की रक्षाभावना से योगमाया के द्वारा अपने समस्त स्वजन सम्बन्धियों को द्वारिका में पहुंचा दिया ।शेष प्रजा की रक्षा के लिए बलराम जी को मथुरा में छोड़ दिया ।इससे इस्पस्ट है कि श्री कृष्ण जी ने समस्त यदुवंशियों को ही द्वारिका पहुंचाया था जो उनके स्वजन संबंधी थे ,ना कि नन्द -यशोदा आदि गोपों को ।उनको तो ब्रज में ही छोड़ दिया था जिनसे काफी समय बाद सूर्यग्रहन पर्व पर कुरुक्षेत्र में आने पर पुनः नन्द ,यशोदा ,राधा जी तथा अन्य गोपों से ब्रज में मिले थे ।इससे प्रमाणित होता है कि नन्द जी गोप वंश के थे न कि यदुवंश से।नन्द आदि गोपों को यदुवंशियों का परम हितैषी कहा गया है न कि यदुवंस में उत्पन भाई के रूप में (श्रीमद् भागवत दशम स्कंध ,अध्य्याय 82 श्लोक 14 ) ।मत्स्य पुराण ,विष्णुपुराण ,गर्गसंहिता ,वायुपुराण ,हरिवंश पुराण ,अग्निपुराण ,महाभारत ,वरहमपुरान ,शुखसागर ,ब्रह्मवैवतरपुरान आदि अनेक पौराणिक ग्रंथों में नन्दादि गोपों का अहीर जाति के अनुसार वर्णन मिलता है ।श्री कृष्ण के लिए सभी जगह यादव /यदुवंशी शब्द का प्रयोग हुआ है ।अब यह बात अलग है कि कोई व्यक्ति किसी पौराणिक या ऐतिहासिक सन्दर्भ का अपने स्वार्थ या पक्ष में किस प्रकार अर्थ निकाल रहा है ,अर्थात अर्थ का अनर्थ कर रहा है ।इसके अलावा सैकड़ों प्रमाण है जिनसे यह सिद्ध होता है कि भगवान् श्री कृष्ण महाराज यदु के वंशज "यदुकुल शिरोमणी "है और नन्द जी के वंश का यदुवंश से कोई भी ताल -मेल का प्रमाण नही मिलता किसी भी प्रमाणिक सर्व मान्य ग्रन्थ या वेद में । गर्ग जी ने स्वयं नन्द जी से श्री कृष्ण के नामकरण के समय कहा था कि यह तुम्हारा पुत्र पहले वासुदेव जी के घर भी पैदा हुआ है।इस लिए इस रहस्य को जानने वाले लोग इस बालक को "श्रीमान वासुदेव "भी कहते है ।कृष्ण के वंश का वर्णन भी इस प्रकार है।
मंडलकमीशंन के सचिव सदस्य S. S. Gilके अनुसार "सच पूछिये तो जाति चिन्ह के रूप में "यादव "शब्द को 1920 के दशक में ढूंडा गया ,जब कई परम्परागत पशु पालक जातियों ने एकजुट होकर भगवान् कृष्ण से अपने वंश का सम्बन्ध जताते हुये अपने इस्तर को ऊपर उठाना चाहा ।उनका कहना था कि कृष्ण स्वयंम पशुपालक थे और "राजा यदु "के वंशज थे ।इस लिए वे इस नतीजे पर पहुंचे कि यह सव जातियां वस्तुतः भगवान् कृष्ण के वंशज है इस लिए उन्हें अपने को "यादव" कहना चाहिये ।किंत्तु यह सही नहीं है ।यह ठीक है कि यादव उस समय विभिन्न गोत्रों /उपनामों का प्रयोग कर रहे थे और उनमें स्वयंम छोटे -बड़े की भावना घर कर गयी ।लेकिन अब समय के अनुसार सभी यदुवंशियों को पुनः संगठित होना चाहिए ।संगठन में बहुत बड़ी ताकत होती है ।इसके साथ -साथ शिक्षित भी होना अति आवस्यक है जिससे समाज में विकास संभव हो ।आज का युग शिक्षा और सम्रद्धि का युग है ।जिस समाज के पास ये दोनों है वही समाज आज विकास की ओर अग्रसर है ।जय हिन्द ।जय यदुवंश ।जय श्री कृष्णा ।
प्रचार -प्रसार द्वारा - राज यदुवंशी , सुल्तानपुर बहेड़ी बरेली( यूपी)
        ऍम ए इतिहास , पीजी डिप्लोमा इन मैनेजमेंट
लेखक -डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन  ,व्याख्याता कृषि ,राजकीय महाविद्यालय सवाईमाधोपुर ,राजस्थान ।
लेखक आभारी है श्री महावीर सिंह जी ,पूर्व प्रवक्ता हिंदी ,ग्राम -रणवारी ,तहसील -छाता ,जिला -मथुरा ,उत्तरप्रदेश जिनकी मदद से ये लेख लिखा गया है ।मैं उनका तहे दिल से आभार प्रकट करता हूँ और भविष्य में आशा करता हूँ कि वे अपना यदुवंश इतिहास लेखन में सहयोग देते रहेंगे ।जय श्री राधे -कृष्णा । सभी यदुवंशी भाइयों को सादर प्रणाम । 

जैसा दोगें वैसा ही लौट कर थाली में वापिस आएगा

जैसा दोगें वैसा ही लौट कर थाली में वापिस आएगा



एक बार एक सर्वगुणी राजा घोड़े के तबेलें में घुमनें में व्यस्त थे तभी एक साधु भिक्षा मांगने के लिए तबेलें में ही आए और राजा से बोले  "मम् भिक्षाम् देहि..!!" राजा ने बिना विचारे तबेलें से घोडें की लीद उठाई और उसके पात्र में डाल दी। राजा ने यह भी नहीं विचारा कि इसका परिणाम कितना दुखदायी होगा। साधु भी शांत स्वभाव होने के कारण भिक्षा ले वहाँ से चले गए। और कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी। कुछ समय उपरान्त राजा उसी जंगल में शिकार वास्ते गए। राजा ने जब जंगल में देखा एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का ढेर लगा था। उसने देखा कि यहाँ तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोडें दिखाई दे रहे हैं। वह आश्चर्यचकित हो कुटिया में गए और साधु से बोले "महाराज! आप हमें एक बात बताइए यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं न ही तबेला है तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहा से आई !" साधु ने कहा " राजन्! लगता है आपने हमें पहचाना नही! यह लीद तो आपकी ही दी हुई है!" यह सुन राजा ने उस साधु को ध्यान से देखा और बोले हाँजी महाराज! आपको हमने पहचान लिया। पर आप हमें एक बात का जवाब दीजिए हमने तो थोड़ी-सी लीद दी थी पर यह तो बहुत सारी हो गयी है इतनी सारी कैसे हो गयी कृपया कर हमें विस्तार से समझाइए। साधु ने कहा "आप जितनी भी भिक्षा देते है और जो भी देते है वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित हो जाती है यह उसी का परिणाम है। और जब हम यह शरीर छोड़ते है तो आपको यह सब खानी पड़ेगी।" राजा यह सब सुनकर दंग रह गया और नासमझी के कारण आँखों में अश्रु भर चरणों में नतमस्तक हो साधु महाराज से विनती कर बोले "महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए मैं तो एक रत्ती भर लीद नहीं खा सकूँगा।आइन्दा मैं ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।" कृपया कोई ऐसा उपाय बता दीजिए! जिससे मैं अपने कर्मों को वजन हल्का कर सकूँ!" साधु ने जब राजा की ऐसी दुखमयी हालात देखी तो उन्होंने कहा "राजन्! एक उपाय है जिसमें आपको ऐसा कारज करना है जिससे सभी प्रजाजन आपकी निंदा करें आपको ऐसा कोई कारज नहीं करना है जो गलत हो! आपको अपने को दूसरों की नज़र में गलत दर्शाना है बस!! और अपनी नजर में वह कारज आपने न किया हो।" यह सुन राजा ने महल में आ काफी सोच-विचार कर जिससे कि उनकी निंदा हो वह उसी रात एक वैश्या के कोठे पर बाहर ही चारपाई पर रात भर बैठ रात बिता जब सब प्रजाजन उठ गए तो वापिस आये तो सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि कैसा राजा है कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है क्या यह शोभनीय है ??  बगैरा-बगैरा!! इसप्रकार की निंदा से राजा के पाप की गठरी हल्की होने लगी। अब राजा दोबारा उसी साधु के पास गए तो घोड़े की लीद के ढेर को मुट्ठी भर में परवर्तित देख बोले "महाराज! यह कैसे हुआ? ढेर में इतना बड़ा परिवर्तन!!" साधू ने कहा "यह निंदा के कारण हुआ है राजन् आपकी निंदा करने के कारण सब प्रजाजनों में बराबर-बराबर लीद आप बँट गयी है जब हम किसी की बेवजह निंदा करते है तो हमें उसके पाप का बोझ उठाना होता है अब जो तुमने घोड़े की लीद हमें दी थी वह ही पड़ी ही वह तो आपको ही थाली में दी जायेगी। अब इसको तुम चूर्ण बना के खाओ, सब्जी में डाल के खाओ या पानी में घोलकर पीओ यह तो आपको ही खानी पड़ेगी राजन्! अपना किया कर्म तो हमें ही भुगतना है जी चाहे हँस के भुगतो या रो कर सब आप ही भोगना है।
"जैसा दोगें वैसा ही लौट कर थाली में वापिस आएगा!"

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई

एक दोहे का चमत्कार.........
बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढें!


.
एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे
थे । एक दिन उस ने अपने दरबार मे उत्सव रखा । उत्सव मे मुजरा करने वाली और अपने गुरु को बुलाया । दूर देश के राजाओं को भी । राजा ने कुछ मुद्राए अपने गुरु को दी जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वह मुद्रा गुरु देगा।
सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उस को जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा ,

" बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए। "

अब इस दोहे का अलग अलग व्यक्तियों ने अलग अलग अपने अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।
* तबले वाला सतर्क हो बजाने लगा ।
* जब ये बात गुरु ने सुनी, गुरु ने सारी मोहरे उस मुज़रा करने वाली को दे दी
* वही दोहा उस ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार दे दिया ।
* उस ने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतार कर दे दिया ।
* वही दोहा दोहराने लगी राजा ने कहा बस कर एक दोहे से तुम ने वेश्या हो कर सब को लूट लिया है ।
जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी गुरु के नेत्रो मे जल आ गया और कहने लगा, "राजा इस को तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है । इस ने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया हूँ । भाई मै तो चला।
राजा की लड़की ने कहा, " आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसनें मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ? "
राजा के लड़के ने कहा, " आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आप के सिपाहियो से मिल कर आप का क़त्ल करवा देना था ।इस ने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हे ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो?
जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी राजतिलक कर दूँ , गुरु भी मौजूद है । उसी समय राज तिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटा, " मैं आपकी शादी जल्दी कर दूँगा। "
मुज़रा करने वाली कहती है , " मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, मै तो ना सुधरी। आज से मै अपना धंधा बंद करती हूँ। हे प्रभु ! आज से मै भी तेरा नाम सिमरन करुँगी ।

साभार:-
pictures courtesy


गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

ईश्वर मेंं विश्वास

ईश्वर मेंं विश्वास


 वह गाड़ी से उतरा और बड़ी तेज़ी से एयरपोर्ट मे घुसा , जहाज़ उड़ने के लिए तैयार था , उसे किसी कांफ्रेंस मे पहुंचना था जो खास उसी के लिए आयोजित की जा रही थी.....वह अपनी सीट पर बैठा और जहाज़ उड़ गया...अभी कुछ दूर ही जहाज़ उड़ा था कि....कैप्टन ने ऐलान किया  , तूफानी बारिश और बिजली की वजह से जहाज़ का रेडियो सिस्टम ठीक से काम नही कर रहा....इसलिए हम क़रीबी एयरपोर्ट पर उतरने के लिए मजबूर हैं.।
जहाज़ उतरा वह बाहर निकल कर कैप्टन से शिकायत करने लगा कि.....उसका एक-एक मिनट क़ीमती है और होने वाली कांफ्रेस मे उसका पहुचना बहुत ज़रूरी है....पास खड़े दूसरे मुसाफिर ने उसे पहचान लिया....और बोला डॉक्टर त्रेहन साहब आप जहां पहुंचना चाहते हैं.....टैक्सी द्वारा यहां से तीन घंटे मे पहुंच सकते हैं.....उसने शुक्रिया अदा किया और टैक्सी लेकर निकल पड़ा...

लेकिन ये क्या आंधी , तूफान , बिजली , बारिश ने चलना मुश्किल कर दिया , फिर भी वह चलता रहा...अचानक ड्राइवर को एह़सास हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है...
नाउम्मीदी के उतार चढ़ाव के बीच उसे एक छोटा सा घर दिखा....इस तूफान मे वही ग़नीमत समझ कर गाड़ी से नीचे उतरा और दरवाज़ा खटखटाया....
आवाज़ आई....जो कोई भी है अंदर आ जाए..दरवाज़ा खुला है...

अंदर एक बुढ़िया आसन बिछाए भगवद् गीता पढ़ रही थी...उसने कहा ! मां जी अगर इजाज़त हो तो आपका फोन इस्तेमाल कर लूं...
बुढ़िया मुस्कुराई और बोली.....बेटा कौन सा फोन ?? यहां ना बिजली है ना फोन..
लेकिन तुम बैठो..सामने चरणामृत है , पी लो....थकान दूर हो जायेगी..और खाने के लिए भी कुछ ना कुछ मिल जायेगा.....खा लो ! ताकि आगे सफर के लिए कुछ शक्ति आ जाये...

डाक्टर ने शुक्रिया अदा किया और चरणामृत पीने लगा....बुढ़िया अपने पाठ मे खोई थी कि उसकेे पास उसकी नज़र पड़ी....एक बच्चा कंबल मे लपेटा पड़ा था जिसे बुढ़िया थोड़ी थोड़ी देर मे हिला देती थी...
बुढ़िया फारिग़ हुई तो उसने कहा....मां जी ! आपके स्वभावऔर एह़सान ने मुझ पर जादू कर दिया है....आप मेरे लिए भी दुआ कर दीजिए....मुझे उम्मीद है आपकी दुआऐं ज़रूर क़बूल होती होंगी...
बुढ़िया बोली....नही बेटा ऐसी कोई बात नही...तुम मेरे अतिथी हो और अतिथी की सेवा ईश्वर का आदेश है....मैने तुम्हारे लिए भी दुआ की है.... परमात्मा का शुक्र है....उसने मेरी हर दुआ सुनी है..
बस एक दुआ और मै उससे माँग रही हूँ शायद  जब वह चाहेगा उसे भी क़बूल कर लेगा...

 कौन सी दुआ..?? डाक्टर बोला...

बुढ़िया बोली...ये जो बच्चा तुम्हारे सामने अधमरा पड़ा है , मेरा पोता है , ना इसकी मां ज़िंदा है ना ही बाप , इस बुढ़ापे मे इसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर है , डाक्टर कहते हैं...इसे खतरनाक रोग है जिसका वो इलाज नही कर सकते , कहते हैं एक ही नामवर डाक्टर है , क्या नाम बताया था उसका ! हां "त्रेहन" ....वह इसका ऑप्रेशन कर सकता है , लेकिन मैं बुढ़िया कहां उस तक पहुंच सकती हूं ? लेकर जाऊं भी तो पता नही वह देखने पर राज़ी भी हो या नही ? बस अब बंसीवाले से ये ही माँग रही थी कि वह मेरी मुश्किल आसान कर दे..!!

डाक्टर की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा है....वह भर्राई हुई आवाज़ मे बोला !
 माई...आपकी दुआ ने हवाई जहाज़ को नीचे उतार लिया , आसमान पर बिजलियां कौदवां दीं , मुझे रस्ता भुलवा दिया , ताकि मैं यहां तक खींचा चला आऊं ,हे भगवान! मुझे यकीन ही नही हो रहा....कि कन्हैया एक दुआ क़बूल करके अपने भक्तौं के लिए इस तरह भी मदद कर सकता है.....!!!!
●●●●
वह सर्वशक्तीमान है....परमात्मा के बंदो उससे लौ लगाकर तो देखो...जहां जाकर इंसान बेबस हो जाता है , वहां से उसकी परमकृपा शुरू होती है...। ॐ शान्ति..🙏🏼

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

सीधे-सीधे लिख दें


घने जंगल से गुजरती हुई सड़क के किनारे एक ज्ञानी गुरु अपने चेले के साथ एक साइनबोर्ड लगाकर बैठे हुए थे, जिस पर लिखा था -


“ठहरिये … 

आपका अंत निकट है ! 

इससे पहले कि बहुत देर हो जाये , रुकिए ! … 

हम आपका जीवन बचा सकते हैं !”



एक कार फर्राटा भरते हुए वहाँ सेगुजरी. चेले ने ड्राईवर को बोर्डपढ़ने के लिए इशारा किया
…ड्राईवर ने बोर्ड की ओर देखकर भद्दी सी गाली दी और चेले से यह कहता हुआ निकल गया –
“तुम लोग बियाबान जंगल में भी धंधा कर रहेहो ! शर्म आनी चाहिए !”

चेले ने असहाय नज़रों से गुरूजी की ओर देखा.

गुरूजी बोले – “जैसे प्रभु की इच्छा !”

कुछ ही पल बाद कार के ब्रेकों के चीखने की आवाज आई और एक जोरदार धमाका हुआ.

कुछ देर बाद एक मिनी-ट्रक निकला. उसका ड्राईवर भी चेले को दुत्कारते हुए बिना रुके आगे चला गया.कुछ ही पल बाद फिर ब्रेकों के चीखने की आवाज़ और फिर धड़ाम …. !

गुरूजी फिर बोले – “जैसी प्रभु की इच्छा !”

अब चेले से नहीं रहा गया. बोला – “गुरूजी, प्रभु की इच्छा तो ठीक है पर कैसा रहे यदि हम इस बोर्ड पर सीधे-सीधे लिख दें कि -..

‘आगे पुलिया टूटी हुई है’ … !!!”


मंगलवार, 21 मार्च 2017

रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।



रामायण कथा का एक अंश       जिससे हमे सीख मिलती है "एहसास" की...


श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत पथरीली और कंटीली थी !
की यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया !

श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे !
बोले- "माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी ?"

धरती बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"

प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे आघात मत करना"

श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकुलता क्यों ?"

श्री राम बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा !"

"हृदय विदीर्ण !! ऐसा क्यों प्रभु ?",
धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !

"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!"

अर्थात 
रिश्ते अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ गहरी आत्मीयता नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु दिखावा हो सकता है ।

इसीलिए कहा गया है कि...
रिश्तेखून से नहीं, परिवार से नही,
मित्रता से नही, व्यवहार से नही,
बल्कि...
सिर्फ और सिर्फ आत्मीय "एहसास" से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं।
जहाँ एहसास ही नहीं, 
आत्मीयता ही नहीं ..
वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा l

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

महाशिवरात्रि महापर्व





इस रात्रि का हर कोई बेसब्री से इंतजार करता हैं । कुछ लोग तो दिन में ही शिव रात्रि महापर्व को दिन में ही संपन्न कर देते हैं तो कुछ पूरी रात जागते हैं शिव के साथ। इस दिन भांग का प्रसाद जगह जगह मंदिरो में बांटा जाता हे।।।लेकिन क्यों??? भांग धतूरा आदि ऐसी वनस्पति हे जो बेहद कड़वी और नशे से भरपूर होती हे।
शिव भक्तो को इस दिन उपवास(व्रत) निर्जला रखकर पूरी रात भजन कीर्तन हवन पाठ आदि करने चाहिए।।
कुछ लोगो का मानना हे की शिवजी को भांग धतूरा बेहद प्रिये हे ।।

 मेरा यह मानना नही हे।
सृष्टि की रचना पूरी करते वक़्त जब वनस्पति की उत्पत्ति हुई तो कुछ वनस्पति जेसे भांग धतूरा बेल आदि भी उत्पन हुए ।तो ब्रहम्मा जी ये सब देख आँखे बन्द करली और महेश्वर जी का ध्यान किया ।। उनके दर्शन हुए तो उनको इस बारे में बताते हुए कहा में ये सब नही देख सकता इतनी भयानक वनस्पति को जो विष के समान हे। इसको नष्ट करिये प्रभु ।। तब मेहश्वर जी ने कहा ब्रहम्मा जी जो अमृत समान वनस्पति हे उसको आप बाँट दो सृष्टि के कल्याण के लिए।और जो वनस्पति विष के समान हे (भांग धतूरा)आदि।
सब मुझे अर्पण करदो मुझे स्वीकार हे।।।
ऐसे हे मेरे दाता।।
बाँट दिया अमृत खुद विषपान किया।।।
सब कहते हैं भोले की बूटी हे ।
अरे तो भोले को चढ़ा दो खुद इसका सेवन कर भोले जी को क्यों बदनाम करते हो।
दिन में भांग पीकर कहेंगे हम भोले का प्रसाद पीकर आये हैं।भंग के नशे में खुद का होश नही रहता भक्ति क्या कर पाओगे।
भोले का प्रसाद ही पीना हे तो प्रभु नाम रसपान करो ।।
अमृत भी फीका लगेगा फिर।।
ॐ नमः शिवाय।।।
आप सभी जन को महाशिवरात्रि महापर्व की शुभकामनायें

विक्रम यादव चंडीगढ़
9417004419
fb/vikramyadavchd

वास्तविक शिवरात्रि उत्सव


स्वयं में शिवतत्व को पाना ही वास्तविक शिवरात्रि उत्सव है


शिवरात्रि का शुभ काल शिव-तत्व को जगाने के लिए है, जो चेतना का सबसे सुंदर पहलू है। भगवान शिव वह

शाश्वत तत्व (सिद्धांत) हैं, जो इस सृष्टि का सार है। इस सिद्धांत से ही सब कुछ उपजा है। इसमें ही सब कुछ विलीन हो जाता है।

नटराज रूप में शिव का चित्रण एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जिसमें अस्तित्व के गहरे अर्थ को समग्र रूप से समाविष्ट किया गया है। नटराज भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत के बीच परस्पर आदान-प्रदान के प्रतीक हैं। नटराज की 108 भंगिमाओं में आनंद तांडव परमानंद का नृत्य है, जो सबसे लोकप्रिय और सुंदर माना जाता है। शिव तांडव का इतना सुंदर और मनमोहक निरूपण अन्यत्र कहीं नहीं है।

गहरे ध्यान और भौतिक जगत के प्रति वैराग्य के माध्यम से जब हम आलौकिक संसार तक पहुंच पाते हैं, तब हम आनंद तांडव का अनुभव करने में सक्षम हो जाते हैं। शिव तांडव निरंतर और सतत रूप से हो रहा है। शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार तंत्र के पार जाने के बाद ही ब्रह्मांडीय लय के इस आनंद तांडव का अनुभव किया जा सकता है।

शिव अनादि हैं। शिव अनंत हैं। उन्हें किसी विशेष देश और काल में निरूपित करना उस शाश्वत सिद्धांत को सीमित करना है, जो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। नृत्य करते शिव के एक हाथ में डमरू अनंत के आकार में है। यह ध्वनि और आकाश का प्रतीक है। यह ब्रह्मांड के विस्तार और विलीन होने की प्रकृति का

प्रतीक है। अपरिमित ध्वनि के माध्यम से असीम अनंत की परिकल्पना हम कर सकते हैं। नटराज के ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि ब्रह्मांड की मौलिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है। आनंद ऊर्जा को पुष्ट करता है, जबकि भोग उसे क्षीण करता है।

निचला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है, जो सुरक्षा और सुव्यवस्था के आश्वासन का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरा हाथ पैर कीओर इशारा करते हुए अनंत संभावनाओं का संकेत है। पैरों के नीचे अपस्मार राक्षस है, जो अज्ञानता का प्रतीक है। यह अनियंत्रण की अवस्था को दर्शाता है, जिसमें शरीर और जीवनशक्ति पर कोई काबू नहीं रहता है।

जब मानव चेतना अज्ञानता के बंधनों से खुद को मुक्त करने में सक्षम हो जाती है और शरीर-मनतंत्र पर नियंत्रण हासिल कर पाता है, तब जीवन में परमानंद का नृत्य प्रारंभ होने लगता है। शिवरात्रि का समय विशिष्ट है, जिसमें सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर अनंत, भोले और आनंदपूर्ण शिवतत्व की सर्वोच्च महिमा को आत्मसात किया जा सकता है। स्वयं में शिवतत्व को पाना ही वास्तविक शिवरात्रि उत्सव है।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

आर्ट 4 पीस अवार्ड 2017 से सम्मानित हुए यदुवंश के दो प्रतिभावान

आर्ट 4 पीस अवार्ड 2017 का पहला पहला वार्षिक अवार्ड कॉन्सिट्यूशन कल्ब नईदिल्ली में आयोजन हुआ। दुनिया भर में शांति के संदेश के साथ शुरु हुआ आर्ट 4 पीस अवार्ड का अद्भूत कार्यक्रम का आयोजन फेम फायंडर्स मीडिया और मुन्नी आयरोनी की संयुत्त तत्वाधान में किया गया। धर्मागिरी प्रॉडक्शन की गिरिजा यदुवंशी ने खास सहयोग दिया। आर्ट 4 पीस के संस्थापक मुन्नी आयरोन ने आयोजन में अपने स्पीच से चार चांद लगा दिए। इस आयोजन में पूरे देश से करीब 200 अतिथियों ने भाग लिया और रंगारंग कार्यक्रम का आनंद लिया।


इस मौके पर कला व संस्कृति में उत्कृष्ट कार्य करने वाले को सम्मानित किया गया जिसमें 15 श्रेणी रखे गए। इसमें प्रसिद्ध कत्थक डांसर बिरजू महाराज के पुत्र दीपक महाराज को कत्थक में योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इन्दर यादव फोटोग्राफी, राहुल माखन आरजे, अभिनव चंद्र आरजे, नीरज सक्सेना शिक्षा, लारा शाह मोटिवेटर, जिंतेद्र शाह डिजाइनर, पर्सनालिटी डेवलपमेंट रीता गगवानी, कविता शा क्रियेटिव राइटिंग, विद्या टिकारी मेकअप, हरमिंदर मक्कर डायरेक्शन, विशाल श्रीवास्तव म्यूजिक, दीपक महाराज क्लासिकल डांसर, मनोज बख्शी एक्टिंग, निखिल वर्मा फाइन आर्ट्स को आर्ट 4 पीस अवार्ड से सम्मानित किया गया।


 गौरतलब है कि आर्ट 4 पीस अवार्ड 2017 की संस्थापिका मुन्नी आयरोन आध्यात्मिक गुरु, प्रसिद्ध कोचए वैश्विक राजदूतए टीवी होस्ट, निर्माता, 11 पुस्तकों की लेखिका कई तरह के कार्यों में अपने आपको फैलाए हुए हैं। और वे नौ चैरिटी की मेजर डॉनर हैं। लगातार विश्व टूर पर रहती हैं जिनका उद्देश्य है कि लोगों के होठों पर खुशी हो और इसी कार्य में लगी हैं। आयरोन के स्वभाव में अपने कार्य के प्रति जिद है, जुनून है। फेम फाइंडर्स मीडिया के संस्थापक मनोज जोशी ने कहा कि विश्व की शांति और अखंडता बनाए रखने के लिए यह कार्यक्रम किया गया जिसका प्रसार एशिया के कई देशों में है। इस मौके पर पीस लीडर का भी चुनाव किया गया। जिसमें प्रमुख नाम है ऋचा पांडे, सुप्रीम कोर्ट, एडवोकेट हैं। नीहारिका सिंह को यूथ पीस लीडर चुनाव गया हैए जो पूरे देश में संदेश को फैलाएंगी। श्रुति शर्मा को पीस एंबेसडर नियुक्त किया है।⁠⁠⁠⁠

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
 २१ फ़रवरी को मनाया जाता है। १७ नवंबर१९९९ को यूनेस्को ने इसे स्वीकृति दी।
इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवँ सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है।







‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य  में देश में भाषा’ यह एक व्यापक चर्चा का विषय बना है- एक तरफ देश में मातृभाषा का      महत्व कम होता दिखाई दे रहा है। विश्व में विगत 40 वर्षों  में लगभग  150 अध्ययनों के निष्कर्ष हैं कि      मातृभाषा में ही शिक्षा होनी चाहिएक्योंकि  बालक को माता के गर्भ से ही मातृभाषा के संस्कार प्राप्त होते हैं। भारतीय वैज्ञानिक सी.वी.श्रीनाथ शास्त्री के अनुभव  के अनुसार अंग्रेजी माध्यम से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने वाले की तुलना में भारतीय भाषाओं के माध्यम     से पढ़े छात्रअधिक   वैज्ञानिक अनुसंधान करते हैं।राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केन्द्र की डॉ नन्दिनी सिंह के  अध्ययन (अनुसंधान) के  अनुसारअंग्रेजी की पढ़ाई से मस्तिष्क का     एक ही हिस्सा सक्रिय होता हैजबकि हिन्दी की पढ़ाई से मस्तिष्क के दोनों भाग सक्रिय होते हैं। सर आइजेक पिटमैन ने कहा है कि संसार में यदि कोई सर्वांग पूर्ण लिपि है तो वह देवनागरी है। विदेशी भाषा      के माध्यम  से पढ़ाई अनुसंधान, पुस्तकें  आदि आधुनिकता के भी विरूद्ध हैक्योंकि आधुनिक-ज्ञान,   समाज के सभी वर्गो तक अपनी भाषा में ही पहुंचाया जा सकता है।

      लेकिन दूसरी तरफ आज दुनिया के लगभग 170 देशों में किसी न किसी  रूप में हिन्दी पढ़ायी जाती  है। विश्व के 32 से अधिक देशों के विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई  जा रही है। इंग्लैण्ड के सेंट जेम्स विद्यालय में 6 वर्ष तक संस्कृत पढ़ना अनिवार्य है। पहले भारत में    भी जहां कहीं हिन्दी का विरोध (राजनैतिक आदि कारणो से) था या जहां हिन्दी का प्रयोग कम  माना जाता था जैसा कि तमिलनाडुमिजोरमनागालैण्ड आदि . अब इन राज्यों में भी हिन्दी  बोलने-सिखाने हेतु हिन्दी स्पीकिंग क्लासेस बड़ी मात्रा में प्रारंभ हुए हैं। अरूणाचल राज्य की एक प्रकार से राजभाषा हिन्दी है तथा नागालैण्ड राज्य ने द्वितीय राजभाषा करके हिन्दी को मान्यता दी है। दक्षिण      हिन्दी प्रचार सभामद्रासराष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा आदि की हिंदी परीक्षाओं में भारी संख्या में लोग सहभागी हो रहे है। वास्तव में भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से चुनौती नहीं है, बल्कि अंग्रेजी मानसिकता वाले भारतीयों से है। हमें हिन्दी की या भारत की किसी भाषा की वकालत नहीं      करनी हैलेकिन राष्ट्रहित की दृष्टि से जो वैज्ञानिक एवं तर्कसम्मत हैउसकी वकालत अवश्य करनी है।

मातृभाषा सीखने समझने एवं ज्ञान की प्राप्ति में सरल है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ  अब्दुल कलाम ने स्वयं  के अनुभव के आधार पर कहा है कि ‘‘मैं  अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बनाक्योंकि मैंने  गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में  प्राप्त   की (धरमपेठ कॉलेज नागपुर)।’’ अंग्रेजी भाषा माध्यम में पढ़ाई में अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। मेडिकल या इंजीनियरिंग पढ़ने हेतु पहले अंग्रेजी सीखनी पड़ती है बाद में उन विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है।    पंडित मदन मोहन मालवीय अंग्रेजी के ज्ञाता थे। उनकी अंग्रेजी सुनने अंग्रेज विद्वान भी आते थे ।लेकिन उन्होंने कहा था कि‘‘मैं      60 वर्ष से अंग्रेजी का प्रयोग करता आ रहा हूँपरन्तु बोलने में हिन्दी जितनी सहजता अंग्रेजी में नहीं आ पाती।

इसी प्रकार विश्व कवि रविन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा है:- ‘‘ यदि विज्ञान को  जन-सुलभ बनाना है  तो  मातृभाषा के  माध्यम से  विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।’’

महात्मा गांधी का कथन-  विदेशी माध्यम ने  बच्चों  की तंत्रिकाओं पर भार डाला हैउन्हें  रट्टू बनाया हैवह सृजन के  लायक नहीं रहे....विदेशीभाषा ने देशी भाषाओं  के  विकास   को  बाधित किया है . 

आज हमारे देश के कुछ तथाकथित विद्वानों द्वारा यह भी तर्क दिया जाता हैकि बिना अंग्रेजी के व्यक्ति या देश का विकास संभव नहीं है।   लेकिन दुनिया के किसी भी महापुरूष      ने यह बात नहीं कही है। अमरीका  के बिल क्लिंटन से बराक ओबामा तक के राष्ट्रप्रमुखों ने अपने छात्रों को सम्बोधित करते हुए यह अवश्य कहा कि गणित और विज्ञान की पढ़ाई अच्छी करिये अन्यथा भारत और चीन के छात्र आपको पीछे छोड़ देंगे। उन्होंने अंग्रेजी के बारे में नहीं कहा। विश्व के आर्थिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सम्पन्न जैसे अमरीका रशिया चीन जापान कोरिया इंग्लैण्ड , फ्रांस, जर्मनी,        स्पेनइजरायल आदि देशों में जन समाजशिक्षा एवं शासन-प्रशासन की भाषा वहां की अपनी भाषा है। इजरायल के 16 विद्वानों ने नोबल पुरस्कार प्राप्त किए है। सभी ने अपनी मातृभाषा हिब्रू  में ही कार्य किया है। इसी प्रकार माइक्रो साफ्ट के सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक संक्रात सानू ने अपनी पुस्तक में दिये गये तथ्यों के आधार   पर यह कहा  है कि  विश्व में      सकल घरेलू उत्पाद में  प्रथम पंक्ति के 20 देशों में सारा कार्य वह    अपनी भाषा में      ही कर रहे हैं, जिसमें चार देश अंग्रेजी भाषी हैक्योंकि उनकी मातृभाषा अंग्रेजी है। वे  आगे लिखते है कि विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में सबसे पिछड़े हुए 20 देशों में विदेशी भाषा में या अपनी और विदेशी दोनों भाषा में उच्च शिक्षा दी जा रही हैं तथा शासन-प्रशासन का कार्य भी इसी प्रकार किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि जब      तक भारत में शिक्षाप्रतियोगी परीक्षाएं एवं न्यायालयों सहित शासन-प्रशासन का कार्य अपनी भाषा में नहीं होगा  तब तक देश आगे नहीं बढ़ सकता। 

नीपा के पूर्व निदेशक श्री प्रदीप जोशी के अनुभव के अनुसार विश्व के ख्याति प्राप्त अणु वैज्ञानिक एवं जापान के हिरोशिमा विश्वविद्यालय के कुलपति अंग्रेजी नहीं जानते । अपने देश में यह भी तर्क दिया जाता है कि वर्तमान वैश्वीकरण के युग में विदेश जाने हेतु अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक

है । भारत से हर वर्ष लगभग दो लाख लोग विदेश जाते हैं। उसमें भी सभी अंग्रेजी भाषा वाले देशों  में नही जाते। इतने लोगों के लिए करोड़ो छात्रों पर अनिवार्य रूप से अंग्रेजी थोपनायह अन्याय एवं अत्याचार नहीं तो और क्या है  वैसे भी किसी भी भाषा को सीखना कोई कठिन कार्य नहीं है।  किसी भी भाषा को 3 से 6            महीने में सीखा जा सकता है ।दूसरी ओर मात्र अंग्रेजी के ज्ञान के कारण विश्व की अन्य भाषाओं     के साहित्य में उपलब्ध ज्ञान    का लाभ अपने देश को प्राप्त नहीं हो पा  रहा है। रशियनजर्मन भाषा में विज्ञान की पुस्तकें अधिक मात्रा में उपलब्ध हैं। इसी प्रकार अच्छे दार्शनिक जर्मन में हुए हैं एवं काव्य- साहित्य तथा पुरातत्व का अधिक साहित्य फ्रांस में प्राप्त है। 

यह भी तर्क दिया जाता है कि उच्च शिक्षा एवं विशेषकर विज्ञान और तकनीकी विषयों की

पुस्तकें अपनी भाषा में उपलब्ध नहीं हैं ।  किसी भी भाषा की पुस्तकों का अनुवाद करना कोई कठिन कार्य नहीं हैपरंतु हमारी मानसिकता भी इसी प्रकार की बनी है कि अंग्रेजी का साहित्य ही श्रेष्ठ है और उसकी नकल करके कार्य चलाया जा रहा है। इस कारण से मौलिक चिंतन के आधार पर अपने देश की आवश्यकतानुसार पुस्तकेंअनुसंधान आदि अकादमिक कार्य बहुत ही कम हो रहा है। हमारी अच्छाइयों और विशेषताओं का महत्त्व  भी हमको ध्यान में नही आता। जैसे प्रयाग (इलाहाबाद)  का सफल कुभं मेला या मुम्बई का डिब्बा प्रबंधन,  ये भी एक श्रेष्ठ प्रबंधन के नमूने हैं। यह बात जब विदेश से लोग इस पर अध्ययन-अनुसंधान करने आए    तब हमारे भारतीय प्रबंधन      संस्थान के विद्वानों को इसका महत्व ध्यान में आया।

भारत के ख्याति प्राप्त अधिकतर वैज्ञानिकों ने अपनी शिक्षा मातृभाषा में ही प्राप्त की है। जिसमें प्रमुख रूप से जगदीश चन्द्र बसुश्रीनिवास रामानुजनडॉ अब्दुल कलाम आदि। इसी प्रकार वर्तमान में विभिन्न राज्यों की बोर्ड की परीक्षाओं में उच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थीमातृभाषा में  पढ़ने  वाले   ही अधिक हैं। शिक्षा के विभिन्न आयोगों एवं  देश के महापुरूषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा होनी चाहिएऐसे सुझाव दिये है। महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा हैः-‘‘  बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना  शारीरिक विकास के लिए माँ का दूध’’.

पिछले 175 वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा से देश को काफी नुकसान हो रहा है। बालकों के मस्तिष्क पर अंग्रेजी के कारण बोझ बढ़ा है। यह एक प्रकार से उन पर अत्याचार है। इस कारण से उनका विकास ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। वे न तो ठीक से अंग्रेजी  सीख पाते हैं और न ही मातृभाषा। इसी प्रकार समयपरिश्रम और धन का भी अपव्यय हो रहा है। शिक्षासार्वत्रिक एवं सर्वस्पशीय नहीं हो पा रही है। हमारे यहां अंग्रेजी और गणित में सबसे अधिक बच्चे विफल होते हैं। विदेशी भाषा में जानकारी या कुछ मात्रा में ज्ञान प्राप्त हो सकता है। लेकिन ज्ञान-सृजन नहीं हो सकता। इसी प्रकार शोधकार्य में भी वैश्विक स्तर पर हम पिछड़ रहे हैं। अपने देश में शोधकार्य और साहित्य      सृजन अधिकतर अंग्रेजी  में होने से अपने देश के लोगों के बदले विदेश के लोग उनका ज्यादा लाभ उठा रहे हैं। हमारे देश के विद्वान विदेशों पर निर्भर हो रहें हैं। आज देश में अंग्रेजीउच्च वर्ग की भाषा है और भारतीय भाषाएँ  सामान्य लोगों की हैं, जिसके कारण देश में दो वर्ग खड़े हो गए हैं। विदेशी भाषाओं में  मात्र अंग्रेजी के ज्ञान के कारण हम सारी दुनिया को अंग्रेजी चश्में से ही समझने का प्रयास करते हैं। वास्तव      में दुनिया को ठीक से  समझने एवं अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने हेतु कम से कम आठ भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है- रशियनचाइनीजजापानीस्पेनिसजर्मनअंग्रेजीअरबीफ्रांसीसी है। अंग्रेजी का अधिक प्रभुत्व (प्रचलन) उन्ही देशों में ज्यादा है जो कभी अंग्रेजो की सरकार के अधीन (गुलाम)      थे। अन्य देश अपनी-अपनी  भाषा को महत्व दे रहे     हैं । एक हम है कि अंग्रेजी की गुलामी ढ़ोते चले आ रहे हैं।

यह कहना उचित ही  लगता है कि अंग्रेजी शोषण की भाषा बन गई है। चिकित्सा, इंजीनियरिंग न्याय एवं शासन-प्रशासन के   स्तर पर सर्वत्र अंग्रेजी के प्रयोग के कारण भारत के  लगभग 95 प्रतिशत लोग उसे समझ नहीं पाते। अंग्रेजी पुस्तकों का देश में 2000 करोड़ रूपये से अधिक का व्यवसाय है।

फ्रांसीसीजापानीजर्मनी बोलने वाले 2 प्रतिशत से कम लोग होने के बावजूद उनकी दुनिया में प्रतिष्ठा हैजबकि हिन्दी बोलने वाले लगभग 70 करोड से अधिक होने के बाद भी हम दुनिया में अपमानित हैं। उदाहरण-विगत दिनों में अमरीका एवं आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की प्रताड़ना की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं ।

भाषा संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका होती है। भाषा के पतन से संस्कृति व संस्कारों का भी पतन हो रहा है । भाषा बदलने से मूल्य भी बदल जाते हैं। भाषा संस्कृति का अधिष्ठान है। वर्तमान में भारत में जिस प्रकार अंग्रेजी का    स्थान हैउसी प्रकार सन् 1362 तक ब्रिटेन में फ्रांसीसी का स्थान था। फिनलेन्ड में 100 वर्ष पूर्व स्वीडिश भाषा चलती थीरशिया में जार के जमाने में फ्रांसीसी भाषा का दबदबा था। इन सभी देशों में वहां की जनता एवं शासकों की इच्छा शक्ति  के कारणआज वहां अपनी भाषाओं में सारा कार्य हो रहा हैआवश्यकता है अपने देश की जनता में इस प्रकार की इच्छाशक्ति जागृत करने की। इसकी शुरूआत स्वयं से करनी पडे़गी। इस हेतु सभी  स्थानों पर अपने हस्ताक्षर अपनी      भाषा में करें। किसी भी भाषा में लिखें या बोलें तब भारत‘ – शब्द  का प्रयोग करेंइन्डिया का नहीं। कार्य व व्यवहार में अपनी भाषा का ही उपयोग करें। अपने बालकों को मातृभाषा में ही पढा़यें। अपने संगठनसंस्था के स्तर पर सारा कार्य व्यवहार अपनी ही भाषा में करें। अपने बालकों को मातृभाषा माध्यम के विद्यालय में ही पढाएं । घरकार्यालयदुकान में नाम पट्ट एवं पट्टिकाएं अपनी भाषा में ही लिखे। अपने व्यक्तिगत पत्रआवेदन पत्रनिमंत्रण-पत्र आदि भी मातृभाषा या भारतीय भाषा में लिखें या छपायें।

यह एक लम्बी लड़ाई है। इस हेतु समग्रता से प्रयास करना होगा। प्रथम देशव्यापी जन-जागरण हेतु गोष्ठी,  परिचर्चा,  कार्यशाला,  परिसंवादों के आयोजन के माध्यम से समाज में  अंग्रेजी के बारे में भ्रम फैलाया गया है उसको दूर करके अपनी भाषाओं की वैज्ञानिकता एवं तार्किकता को पुनः स्थापित करना होगा। दूसरा भारतीय भाषाओं में अनुवाद एवं साहित्य सृजन तथा अनुसंधान हेतु शोध केन्द्रों की स्थापना करनी होगी। जहां भी सरकार के स्तर पर भाषा के कानून का भंग किया जा रहा है या  भारतीय भाषाओं को अपमानित किया जा रहा है, उसको रोकने के प्रयास करने होगें और कानूनी लड़ाई भी लड़नी होगी। देश की संसद में भाषा  के प्रश्न पर व्यापक  चर्चा होइस हेतु भारतीय भाषाओं के प्रति निष्ठाप्रेम रखने वाले राजनैतिक पक्षों या सांसदो को एक मंच पर लाकर प्रयास करना होगा। हिन्दी और भारतीय भाषाओं को शिक्षा के माध्यम कराने के साथ-साथ उसे रोजगार से भी जोड़ना होगा। उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में राज्य की राजभाषा एवं संघ की राजभाषा हिन्दी में कार्य होइस हेतु भाषा प्रेमी वकीलों का भी एक मंच बने। सभी भर्ती (प्रतियोगी) परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करके उसके साथ-साथ  हिंदी और भारतीय    भाषाओं      को   महत्व मिलेइस हेतु देश के छात्र संगठनों एवं छात्रों का भी एक मोर्चा  बने।

इन सारे कार्यों को क्रियान्वित करने हेतु भाषा प्रेमी सभी नागरिकों एवं सामाजिकराजनैतिक नेतृत्व एवं      संस्था,  संगठनों को एक मंच पर लाकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा तथा निरन्तर संघर्ष करना होगा। वह ध्रुव सत्य है कि विजयश्री भारतीय भाषाओं को मिलेगी।